बरेली: पहले पैदल चलने वाले भी चुनाव जीत जाते थे
बरेली,अमृत विचार। चुनावी शोरगुल में पुरानी स्मृतियां ताजा की जाएं तो कानों में चुनावी नारों का शोर और आखों के सामने ब्लैक एंड व्हाइट पंफलेट की तस्वीर उभरकर आएगी। डिजिटल वार रूम के जमाने में कई-कई किलोमीटर लंबा पैदल जनसंपर्क और सोशल मीडिया ट्रोलिंग के जमाने में चाय की टपरियों और पान के खोखों पर …
बरेली,अमृत विचार। चुनावी शोरगुल में पुरानी स्मृतियां ताजा की जाएं तो कानों में चुनावी नारों का शोर और आखों के सामने ब्लैक एंड व्हाइट पंफलेट की तस्वीर उभरकर आएगी। डिजिटल वार रूम के जमाने में कई-कई किलोमीटर लंबा पैदल जनसंपर्क और सोशल मीडिया ट्रोलिंग के जमाने में चाय की टपरियों और पान के खोखों पर होने वाली चुनावी चर्चा का खाका दिमाग में खिंच जाएगा।
नया वोटर भले ही सोशल मीडिया की हवा में बह रहा हो लेकिन जिन बुजुर्गों ने आजादी के बाद पहला या उसके बाद से अब तक होते आए चुनाव देखे उनकी स्मृतियों में गोते लगाने से पता चलता है कि लोकतंत्र के इस पर्व में आधुनिकता के रंग तो भरे हैं, मगर नैतिकता का पर्दा आंखों से उतर गया है। पुराने बुजुर्ग बताते हैं की चुनाव से लगभग 2 महीने पहले राजनीतिक पार्टियां तैयारी में जुट जाती थीं।
शहर क्षेत्र में चाय की टपरियों और पान के खोखों पर चर्चा आम हो जाती थी कि चुनाव में किस पार्टी या प्रत्याशी का पलड़ा भारी है। ग्रामीण क्षेत्रों में चौपाल लगाकर पहले के बुजुर्ग चुनाव की बातें किया करते थे। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता छोटे से छोटे मोहल्ले में माननीयों का जनसंपर्क बढ़ जाता।
वरिष्ठ रंगकर्मी और समाजसेवी जेसी पालीवाल अपने पुराने अनुभव ताजा करते हुए बताते हैं कि उन्होनें तो आजादी के बाद 1951 पहला चुनाव देखा और उस वक्त उनकी उम्र महज 17 साल थी। आज तो बिना पैसे के चुनाव लड़ा ही नहीं जा सकता मगर उस जमाने में उन्होनें अपने भाई को महज 336 रुपए में चुनाव लड़कर जीतते हुए देखा।
न इतनी आबादी थी और न लोगों की इतनी जरूरतें। लोगों का ध्यान चमक धमक से ज्यादा नैतिकता पर था। ऐसे नेताओं की भरमार थी जो बंडी और धोती में ही चुनाव लड़ने निकल जाते थे। साईकिल पर चलने वाला तो बहुत दूर की बात, पैदल चलने वाला भी चुनाव जीत सकता था। प्रत्याशी चुनने में भी वोटर संवेदनशीलता दिखाता था। किसी की आपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में अगर पता चल जाए तो लोग ऐसे प्रत्याशी को हिकारत की नजर से देखते थे। 90 का दशक आते-आते काफी कुछ बदला। जाति और धर्म के नाम पर राजनीतिक ध्रुवीकरण तो आम बात हो गई।
मैंने तो आजादी के बाद पहला चुनाव देखा है। लोगों में एक तरह का उत्साह था और नेताओं का भी लोग सम्मान करते थे। क्योंकि उस जमाने में जो नेता चुनाव में उतरे उनमें से अधिकतर ने आजादी के लिए संघर्ष किया था। पहले होने वाले चुनाव के मुकाबले अब स्वरूप बिल्कुल बदल गया है।
—जेसी पालीवाल, वरिष्ठ रंगकर्मी
पहले चुनाव में बेहद सादगी और जमीनी जुड़ाव था। मगर अब तो वार रूम का जमाना है। गली मोहल्लों में चुनाव की चर्चा होती तो है लेकिन उसका दायरा बेहद सीमित है। खासकर युवा तो इससे बेहद दूर हैं। युवाओं को लोकतंत्र के इस पर्व को सोशल मीडिया से बाहर निकलकर भी समझना होगा।
—महेश चंद्र, सिविल लाइंस
पुराने दौर की बात तो छोड़ ही दीजिए वो तो एक गुजरे जमाने की तरह हो गया है। मौजूदा वक्त में चुनाव का माहौल बिल्कुल अलग है। हाथ से लिखी पर्चियां घर पहुंचने का दौर कौन भूल सकता है। गलियों में अलग ही तरह की रौनक होती थी। मोहल्ले नुक्कड़ सभाओं से गुलजार होते थे।
—किशन लाल, आलमगीरीगंज
मैंने तो चुनाव लड़े भी हैं और कई सूरमाओं के चुनाव लड़ाए भी हैं। चुनाव में वो बात अब नहीं रही। पहले तुकबंदी वाले मजेदार नारे होते थे। अब तो भद्दे और धर्मिक उन्माद वाले नारों का बोल बाला है। हमने तो गली-गली जाकर प्रत्याशियों को पोस्टर चिपकाते भी देखा है।
—मलिक शहजाद, पुराना शहर
चुनाव से 2 महीने पहले हमारे मोहल्ले में चर्चा शुरू हो जाती थी। अब भी होता है लेकिन युवा उस जमीनी और विस्तृत बहस से दूर हैं। धर्म और जाति की बहस उन्हे आकर्षित कर रही है और उसी दायरे में रहकर सोच रहे हैं। जबकि पहले ऐसा नहीं हुआ करता था।
—आमिल हुसैन, ब्रह्मपुरा
बरेली: दावेदारों का कांग्रेस कार्यालय पर हंगामा, 5 लाख मांगने का आरोप
