‘आत्मीयता’ की पहचान था भोजन, अब ‘बहस का मुद्दा’
मोहित गौर/अमृत विचार। आजादी मिलने के बाद शुरुआती चुनाव के दौर में प्रत्याशी जनता के साथ आत्मीय होकर उनके दुख दर्द का साझीदार बनते थे। चुनाव प्रचार में जिस गांव में रात हुई वहीं ठौर बना लेते थे। गांव में जनता के बीच भोजन करने से मतदाता और नेता के बीच आत्मीयता का बोध होता …
मोहित गौर/अमृत विचार। आजादी मिलने के बाद शुरुआती चुनाव के दौर में प्रत्याशी जनता के साथ आत्मीय होकर उनके दुख दर्द का साझीदार बनते थे। चुनाव प्रचार में जिस गांव में रात हुई वहीं ठौर बना लेते थे। गांव में जनता के बीच भोजन करने से मतदाता और नेता के बीच आत्मीयता का बोध होता था। लेकिन अब डिजिटल के दौर में चुनाव प्रचार के तरीके बिल्कुल बदल चुके हैं। अब भोज और सहभोज पर भी आयोग की नजर है।
चुनाव आयोग की सख्ती से इस विधानसभा चुनाव में डिजिटल प्लेटफार्म पर प्रचार हो रहा है। सोशल मीडिया लोगों तक पहुंचने का सहारा बना है। डिजिटल प्रचार के माध्यम में लोगों से संवाद भले हो रहा है लेकिन इसमें आत्मीयता का अभाव है। क्योंकि अब खेत मेड़ की पगडंडी पर नेता बैठने से परहेज कर रहे हैं। अब साथ बैठकर खाने की परंपरा बीते दिनों की बात हो चली है। जबकि पहले किसी के घर पेट की भूख शांत की और वहीं चौपाल में चुनावी चर्चा शुरु हो जाती थी। आत्मीयता का माध्यम बना सहभोज अब बहस का मुद्दा बन गया है। हर नेता अपने विपक्षी की गतिविधियों पर नजरें गड़ाए बैठा है। किसी से गुफ्तगूं कर अगर उसके घर का भोजन कर लिया तो विपक्षी हाय तौबा मचाने लगते हैं।
रतनपुर कला गांव के देवेंद्र ठाकुर कहते हैं कि पहले संसाधन सीमित था। प्रत्याशी गांव में आते थे, खेत में पहुंचकर मतदाताओं से मिलते थे। कभी किसी की चौखट पर चौपाल सजी तो कभी किसी अन्य के घर। भोजन भी साथ होता था। अतिथि देवो भव: की परंपरा जीवंत थी। 60 के दशक में ग्रामीण ही नेता जी के भोजन का भी प्रबंध करते थे। इससे आत्मीयता बढ़ती थी। रावेंद्र सिंह ने लंबी सांस लेते हुए कहा कि अब पहले जैसा अपनापन नहीं रह गया। पहले अगर नेता जी वोट मांगने आते थे, तो हमारे साथ खेत-मेड़ पर रोटी खा लेते थे। रात को गांव में चौपाल में घंटों चुनावी चर्चा चलती थी। कोई खाना लाता तो कोई चाय। लेकिन यह दौर व अपनापन खत्म हो गई है। यदि किसी नेता ने दलित के घर भोजन किया तो उसे चुनावी प्रतिद्धंदिता का मुद्दा बना दिया जाता है।
