मुरादाबाद : रैली, जनसभा पर रोक से परवान नहीं चढ़ रही चुनावी फिजा

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Edited By Amrit Vichar
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विनोद श्रीवास्तव/अमृत विचार। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में पहली बार कोरोना संक्रमण की छाया के चलते रैली, जनसभा पर रोक है। इससे चुनावी फिजा परवान नहीं चढ़ रही है। सड़क, गली, चौक-चौराहों पर चुनाव के रंग न दिखने से पहले जैसी न हनक है और न खनक। वर्चुअल …

विनोद श्रीवास्तव/अमृत विचार। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में पहली बार कोरोना संक्रमण की छाया के चलते रैली, जनसभा पर रोक है। इससे चुनावी फिजा परवान नहीं चढ़ रही है। सड़क, गली, चौक-चौराहों पर चुनाव के रंग न दिखने से पहले जैसी न हनक है और न खनक। वर्चुअल रैली व बैठकों का शोर भी राजनीतिक समर का रंग चटख नहीं कर पा रहा है।

  • सोशल मीडिया पर जारी है आरोप-प्रत्यारोप, नामांकन के दौर में भी खामोश हैं मतदाता, नेता जी हवा का रुख भांपने को हैं बेचैन
  • सड़क पर नहीं दिख रही राजनीतिक सरगर्मी, मोबाइल और इंटरनेट पर लोग मशगूल

दूसरे चरण में 14 फरवरी मुरादाबाद मंडल की 27 सीटों पर विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। मगर रैली, जनसभा व रोड शो पर रोक से चुनाव का रंग चटख नहीं हो रहा है। शहर के चौक, चौराहों से लेकर गांव की चौपाल पर चर्चा भी माहौल को पूरी तरह राजनीतिक नहीं बना पा रही है। टिकट पाने वाले प्रत्याशी प्रचार के लिए चंद चुनिंदा लोगों के साथ अपने क्षेत्र में घूम रहे हैं।

मगर न तो नारेबाजी करने वालों की फौज उनके पीछे है न ढोल नगाड़ा और न झाल, मजीरा। पंफलेट और चुनाव चिह्न का खुलकर प्रचार भी इस बार नहीं है। क्योंकि आयोग की पैनी नजर से तो बचना है ही, कोविड प्रोटोकाल का उल्लंघन भी मुकदमा दर्ज कराने में अहम भूमिका निभा रहा है। नेताओं के चेहरे पर लगा मास्क कोविड संक्रमण की गंभीरता बयां कर रही है। सारा चुनावी शोर और जोड़ तोड़ सोशल मीडिया और अन्य साइट्स पर हावी है। मगर आज के दौर में बहुतायत में नागरिक एंड्रायड मोबाइल फोन और इंटरनेट सेवा के प्रयोग से अनजान हैं।

इस दौर में युवा वर्ग ही सोशल मीडिया पर चल रहे चुनावी समर में नारे और गानों का आनंद ले रहा है। बुजुर्ग मतदाताओं की समझ में नहीं आ रहा है यह कैसा चुनावी दौर है जिसमें न भोंपू का शोर है और न प्रचारकों की टोली। मतदाताओं की खामोशी तोड़ना किसी अभेद्य किला भेदने से कम नहीं है। हर किसी ने चुप्पी साध रखी है। जो कुछ है वह मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन पर ही दिख रहा है। प्रत्याशियों और दलों के दिग्गजों को भी रैली, जनसभा, चौपाल पर रोक अंदर तक खल रही है। वह भी जनता के बीच खुले मंच पर खड़ा होकर अपनी बात रखने को बेताब दिख रहे हैं।

ठंड भी ढा रही सितम
सर्दी के मौसम में हो रहे विस चुनाव का रंग फीका करने में ठंड भी सितम ढा रही है। कड़ाके की ठंड और आए दिन मौसम की बेरुखी लोगों के कदमों को घर में ही रोक ले रही है। मौसम विज्ञानियों की माने तो अभी पूरी जनवरी ठंड से राहत मिलने की आस नहीं है। ऐसे में प्रचार-प्रसार के लिए मिले दिन भी ठंड के सितम के बीच गुजर रहे हैं।

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