मुरादाबाद : नामांकन की भीड़ से दिखता था प्रत्याशी का दम

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मुरादाबाद, अमृत विचार। हजारों की भीड़। लाउडस्पीकरों और झंडों से लैस गाड़ियां। जिंदाबाद के नारे। गायकों की मंडली। शोर-शराबा। कुछ साल पहले ऐसा ही नजारा नाकांकन से पहले प्रत्याशियों के जूलूस में देखने को मिलता था। नाकांकन से पहले निकलने वाले यह जूलूस एक तरीका का शक्ति प्रदर्शन होता था। इस जूलूस की भीड़ काफी …

मुरादाबाद, अमृत विचार। हजारों की भीड़। लाउडस्पीकरों और झंडों से लैस गाड़ियां। जिंदाबाद के नारे। गायकों की मंडली। शोर-शराबा। कुछ साल पहले ऐसा ही नजारा नाकांकन से पहले प्रत्याशियों के जूलूस में देखने को मिलता था। नाकांकन से पहले निकलने वाले यह जूलूस एक तरीका का शक्ति प्रदर्शन होता था। इस जूलूस की भीड़ काफी हद तक प्रत्याशियों की स्थिति स्पष्ट कर देती थी। लेकिन अब आयोग के सख्त नियम और कोरोना की मार ने चुनाव के जश्न को फीका कर दिया है।

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सन् 2000 से पहले चुनावों की रंगत ही कुछ और थी। कलक्ट्रेट पर नामांकन के दौरान ये नजारे होते थे विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव। नामांकन की भीड़ से ही प्रत्याशी के दमखम का पता चल जाता था। अब ये शक्ति प्रदर्शन बीते दौर की बात हो गई है। तब भी कलक्ट्रेट पर ही पर्चे दाखिल किए जाते थे। प्रत्याशियों के साथ नामांकन में जाने के लिए संख्या भी निर्धारित थी। लेकिन समर्थक कहां मानते थे। कांग्रेसी नेता असद मौलाई ने बताया कि सन् 2000 के बाद आयोग सख्त हुआ। इससे पहले नामांकन के दौरान कलक्ट्रेट शक्ति प्रदर्शन का केंद्र होता था। यहीं से अंदाजा लग जाता था किसमें कितना दम है।

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घर से लेकर कलेक्ट्रेट तक गाड़ियों का रेला : प्रत्याशी के घर से लेकर कलेक्ट्रेट तक गाड़ियों का रेला, समर्थकों की भीड़ माहौल बना देती थी। संदीप अग्रवाल ऐसे विधायक थे जिनके साथ लोगों की भारी भीड़ पर्चा दाखिल कराने जाती थी। उन्होंने 1993 में पहली बार पर्चा दाखिल करने आए थे। उस दौर की बात ही कुछ अलग थी। नामांकन से ही माहौल बनाया जाता था। शंख, घंटे, लाउडस्पीकर और लोक गायकों की मंडलियां साथ रहती थीं।

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