कुंदरकी में राम लहर में बस एक बार खिला कमल

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विनोद श्रीवास्तव/अमृत विचार। जिले की कुंदरकी विधानसभा सपा पर अब तक सपा का दबदबा रहा है। इस सीट पर हुए अब तक के 11 चुनावों में सर्वाधिक तीन बार सपा ने जीत का परचम लहराया है। लेकिन, इस बार कांटे की टक्कर होने का अनुमान है। शुरुआती दो चुनाव जेएनपी के नाम रहे तो दो …

विनोद श्रीवास्तव/अमृत विचार। जिले की कुंदरकी विधानसभा सपा पर अब तक सपा का दबदबा रहा है। इस सीट पर हुए अब तक के 11 चुनावों में सर्वाधिक तीन बार सपा ने जीत का परचम लहराया है। लेकिन, इस बार कांटे की टक्कर होने का अनुमान है। शुरुआती दो चुनाव जेएनपी के नाम रहे तो दो बार बसपा का हाथी भी चिंघाड़ चुका है। कांग्रेस ने भी यहां एक बार पंजा टिकाकर खाता खोला था। यह सीट दोबारा जीत की टीस भाजपा को दे रही है।

1977 में पहली बार कुंदरकी विधानसभा सीट पर चुनाव हुआ था। यहां से लगातार पहला और दूसरा विधायक चुने जाने का गौरव जेएनपी के अकबर हुसैन के नाम रहा। 1980 में हुए दूसरे विस चुनाव भी अकबर हुसैन जेएनपी (एसआर) के टिकट पर जीते थे, उन्हें 21247 वोट मिला था। 1985 के चुनाव में इस सीट से कांग्रेस की रीना कुमारी ने जीत दर्ज कर अकबर हुसैन लोकदल के प्रत्याशी को हरा दिया। रीना कुमारी इस सीट पर पहली और अब तक की एक मात्र महिला विधायक चुनी गई है। अकबर हुसैन इसके पहले के दोनों चुनाव जीत कर विधानसभा में पहुंचे थे, लेकिन तीसरी बार उन्हें हार का स्वाद चखना पड़ा।

भाजपा से विधायक बने थे चंद्रविजय सिंह
1993 में कुंदरकी से रामलहर में पहली बार कमल खिला। चंद्रविजय सिंह ने उर्फ बेबी राजा ने राममंदिर आंदोलन की लहर का फायदा उठाकर 73083 वोट हासिल कर विधायकी का ताज अपने सिर पर सजाया। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी रहे जनता दल के अकबर हुसैन को 49795 वोट ही मिले।

1996 और 2007 में चिंघाड़ा बसपा का हाथी
1996 में अकबर हुसैन ने बसपा के सिंबल पर चुनाव जीत कर हाथी की चिंघाड़ को विधानसभा में पहुंचा दिया। दूसरे नंबर पर सपा के मो. रिजवान रहे। दूसरी बार 2007 में बसपा के अकबर हुसैन ने एक बार फिर हाथी को चिंघाड़ने का अवसर दिया। उनकी जीत का शुभफल यह रहा कि सूबे में मायावती बसपा सरकार की मुख्यमंत्री बनीं।

राज्य बंटवारे के बाद चली सपा की साइकिल
2002 में यूपी व उत्तराखंड का बंटवारा होने के बाद हुए चुनाव में पहली बार कुंदरकी में सपा की साइकिल चली। इस सीट पर मोहम्मद रिजवान समाजवादी पार्टी के टिकट पर 53348 मत पाकर विधायक बने। 2012 में मोहम्मद रिजवान फिर चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे। उन्होने 81302 वोट लेकर बसपा के रामवीर सिंह को हराया। रामवीर को 64101 ही वोट मिले थे। हालांकि 2007 में सपा यह सीट बचा नहीं पाई और बसपा जीत गई। लेकिन 2017 के चुनाव में मोहम्मद रिजवान ने एक बार फिर यह सीट सपा की झोली में डालकर अपना दमखम साबित किया। उन्हें इस बार 1,10,561 वोट मिले। निकटतम प्रतिद्वंदी रामवीर सिंह भाजपा को 99740 वोट मिले।

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