UP Election 2022 : आज छह विधायकों के कामकाज का इम्तिहान
आशुतोष मिश्र/अमृत विचार। दुनिया भर में अपने हुनर का लोहा मनवाने वाले मुरादाबादी मेहनत की मजदूरी देने में दरियादिली दिखाते हैं। चुने जाने के बाद वादा पूरा करने वाले जनप्रतिनिधि यहां पलकों पर बैठाए गए हैं। लेकिन, जिन्होंने जनादेश की अनदेखी की, उन्हें मतदाताओं ने राजनीति से मिटा भी दिया। सोमवार को फिर यह माटी …
आशुतोष मिश्र/अमृत विचार। दुनिया भर में अपने हुनर का लोहा मनवाने वाले मुरादाबादी मेहनत की मजदूरी देने में दरियादिली दिखाते हैं। चुने जाने के बाद वादा पूरा करने वाले जनप्रतिनिधि यहां पलकों पर बैठाए गए हैं। लेकिन, जिन्होंने जनादेश की अनदेखी की, उन्हें मतदाताओं ने राजनीति से मिटा भी दिया। सोमवार को फिर यह माटी लोकतंत्र के उत्सव में उमंग से साथ हिस्सा लेगी और काम नहीं करने वालों को नकार कर उन्हें पश्चाताप को मजबूर करेगी।
सभी छह विधान सभा क्षेत्रों में जंग की तस्वीर साफ हो गयी है। सत्ताधारी दल के उम्मीदवार विरोधियों के निशाने पर हैं। शहर की चौपाल पर देर रात तक विधायकों की वादाखिलाफी की चर्चा होती रही। अतीत के पन्ने खोलें तो पता चलता है कि साल 2017 के चुनाव में यहां शहर और कांठ सीट पर भाजपा का कब्जा हुआ। देहात, ठाकुरद्वारा, बिलारी और कुंदरकी में सपा की साइकिल दौड़ी थी, जबकि सोमवार को 6 विधायकों सहित 66 उम्मीदवारों के कार्य और संकल्प का जनता मूल्यांकन करेगी। वर्ष 2007 के चुनाव में शहर सीट पर सपा उम्मीदवार के रूप में संदीप अग्रवाल जीते। बाद में उनका निधन हो गया। साल 2012 में सपा के युसुफ अंसारी चुने गए, लेकिन 2017 में भाजपा के रितेश गुप्ता जीत गए। यानी यहां के मतदाता अपने नुमाइंदा बदल देते हैं। जबकि, पहले काम के आधार पर संदीप अग्रवाल लगातार चुने गए।
देहात सीट पर साल 2007 में सपा के उस्मानुल हक चुने गए। 2012 में सपा के ही समीमउल हक निर्वाचित हुए, जबकि 2017 में सपा से जीते हाजी इकराम कुरैशी इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। सालों से भाजपा के लिए यह सीट दूर की कौड़ी है। ठाकुरद्वारा में साल 2007 में बसपा के विजय यादव जीते, जबकि 2012 में यह सीट भाजपा के सर्वेश कुमार सिंह ने छीन ली। लेकिन, उनके सांसद बनने के बाद हुए उप चुनाव में सपा के नजाब जान ने कब्जा कर लिया। साल 2017 में सपा से ही चुने गए नवाब जान की साइकिल फंसी है। कांठ में भाजपा के राजेश सिंह चुन्नू को सपा के कमाल अख्तर से घेर दिया है। साल 2007 में यहां से बसपा के रिजवान खां जीते थे, 2012 में सपा के बागी अनीस-उर-रहमान जीत गए। बीते चुनाव में भाजपा के राजेश की मौका मिला। यानी यहां काम न करने वाले हर बार नकारे गए।
कुंदरकी सीट पर त्रिकोणीय जंग है। भाजपा, सपा और बसपा में लड़ाई है। यहां 2007 में बसपा के हाजी अकबर जीते। लेकिन, 2012 में हार गए। तब से सपा के हाजी रिजवान जीतते आ रहे हैं। इस बार रिजवान बसपा के उम्मीदवार हैं। बिलारी विधान सभा का गठन साल 2008 में हुआ। साल 2012 का चुनाव सपा के इरफान जीते। कार्यकाल में उनके निधन के बाद उप चुनाव में फहीम चुने गए। साल 2017 में उन्हें मौका मिला और कल जनता उसके कार्य का मूल्यांकन करने जा रही है। भाजपा के सिर कभी भी ताज नहीं सजा है। यहां का चुनावी इतिहास बताता है कि जिस भी जनप्रतिनिधि ने वायदे पूरे नहीं किए, उसकी मतदाताओं ने छुट्टी कर दी।
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