कल है फूलेरा दूज, होली तक लगेगा घरों के आंगन में चौक, जानें इस दिन का राधा-कृष्ण से संबंध और पूजा मुहूर्त

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फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को फुलेरा दूज मनाई जाती है। इस दिन से घरों में होली की तैयारियां तेज हो जाती है। मान्यता है कि फाल्गुन की शुक्ल पक्ष की द्वितीया वाले दिन ही कन्हैया राधारानी और गोपियों को मनाने गए और उनके साथ फूलों की होली भी खेली थी। यही …

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को फुलेरा दूज मनाई जाती है। इस दिन से घरों में होली की तैयारियां तेज हो जाती है। मान्यता है कि फाल्गुन की शुक्ल पक्ष की द्वितीया वाले दिन ही कन्हैया राधारानी और गोपियों को मनाने गए और उनके साथ फूलों की होली भी खेली थी। यही कारण है कि मंदिरों में फूलेरा दूज वाले दिन ना केवल विशेष पूजा होती है बल्कि फूलों की होली भी खेली जाती है। इस साल पंचांग के अनुसार, फूलेरा दूज 4 मार्च दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी।

फूलेरा दूज और राधा-कृष्ण का संबंध
कहा जाता है कि एक बार श्री कृष्ण से राधारानी और गोपियां नाराज हो गई थीं। वे इसलिए नाराज हुई थीं क्योंकि श्री कृष्ण उनसे मिलने नहीं आ पाए थे। जब कृष्ण गुप्तचरों से पता चला कि गोपियां और राधारानी ना मिलने कारण नाराज हो गई हैं तो वह उनसे मिलने बरसाने गए। उन्हें प्रसन्न करने के लिए कन्हैया राधारानी पर फूल फेंकने लगे। यह नजारा देखकर गोपिया भी फूल फेंकने लगी। इस तरह से एक दूसरे के ऊपर फूल फेंक कर होली मनाने लगे। जिस दिन फूलों की होली खेली गई उस दिन फाल्गुन शुक्ल द्वितीया थी। इसी दिन से फूलेरा दूज का भी प्रारंभ हो गया। तभी से हर साल फूलों की होली इस दिन खेली जाती है।

शुभ मुहूर्त
फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि प्रारंभ – 3 मार्च, 9:36 रात्रि
फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि समापन – 4 मार्च, 8:45 रात्रि
फूलेरा दूज शुभ मुहूर्त 4 मार्च, 12:10 से 12:56 दोपहर

आज से घरों में बनेगी गुलरियां, बड़ियां और चौक
होलिका दहन में गोबर से बने उपलों को जलाने की परंपरा चली आ रही है। गाय के गोबर से छोटे-छोटे उपले बनाकर एक माला तैयार कर ली जाती है। फिर इस माला को होलिका दहन वाले दिन अग्नी में डालते हैं। इसे ही गुलरियां कहते हैं। जिनको बनाने का काम फुलेरा दूज से शुरू हो जाता है। कहते हैं ऐसा करने से घर में सुख- समृद्धि का वास होता है और शत्रुओं का नाश होता है। परम्परा है कि इसी दिन से घरों के आंगन में आटे और हल्दी का विशेष चौक लगना शुरू हो जाता है। मान्यता है कि इसी जगह होलिका जलाई जाती है तो 15 दिन तक रोज यहां सफाई करके चौक लगाया जाता है और होलिका के दिन यहां रंगों से चौक लगता है। फूलेरा दूज के दिन चौक लगने वाले स्थान को गोबर से लीप कर शुद्ध कर लिया जाता है। इसी दिन से मंगौरी और बड़ियां भी घरों में बनने लगती हैं।

फूलेरा दूज पर होती राधा-कृष्ण की पूजा
इस दूज पर राधा-कृष्ण की पूजा और आराधना की जाती है। भक्त घरों और मंदिरों दोनों जगह में देवता की मूर्तियों सजाते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान जो किया जाता है वह भगवान कृष्ण के साथ रंग-बिरंगे फूलों से होली खेली जाती है। मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है और भगवान कृष्ण की मूर्ति को एक सजाये गए और रंगीन मंडप में रखा जाता है। रंगीन कपड़े का एक छोटा टुकड़ा भगवान कृष्ण की मूर्ति की कमर पर लगाया जाता है, जिसका प्रतीक है कि वह होली खेलने के लिए तैयार हैं।’शयन भोग’ की रस्म पूरी करने के बाद, रंगीन कपड़े को हटा दिया जाता है।

भोग
फुलेरा दूज के दिन पोहा और विभिन्न अन्य विशेष सेव बनाए जाते हैं। भोजन पहले देवता को अर्पित किया जाता है और फिर प्रसाद के रूप में सभी भक्तों में वितरित किया जाता है। देवता के सम्मान में भजन-कीर्तन किया जाता है। होली के आगामी उत्सव के प्रतीक देवता की मूर्ति पर थोड़ा मामूली गुलाल (रंग) फैलाया जाता है। समापन के लिए, पुजारी मंदिर में इकट्ठा होने वाले सभी लोगों पर गुलाल (रंग) छिड़कते हैं।

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