रामपुर नवाब ने लिखे थे होली गीत- फागुन में ब्रजबासी ने लीला रचाई है…

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अखिलेश शर्मा/रामपुर, अमृत विचार। देश में गंगा जमनी परंपरा और कौमी एकता के लिए मशहूर रामपुर रियासत के अंतिम नवाब रजा अली खां अच्छे संगीतकार, गायक और गीतों के लेखक भी थे। नवाब ने रजा अली खां ने होली के जो गीत लिखे उन्हें आज भी गुनगुनाया जाता है। उनके गीतों में ब्रज की भाषा …

अखिलेश शर्मा/रामपुर, अमृत विचार। देश में गंगा जमनी परंपरा और कौमी एकता के लिए मशहूर रामपुर रियासत के अंतिम नवाब रजा अली खां अच्छे संगीतकार, गायक और गीतों के लेखक भी थे। नवाब ने रजा अली खां ने होली के जो गीत लिखे उन्हें आज भी गुनगुनाया जाता है। उनके गीतों में ब्रज की भाषा में घुला प्रेम का रस भी टपकता नजर आता है। कई रागों में लिखकर पिरोया गीत-संगीत यह शोध के विद्यार्थियों के लिए खास है।

नवाब रामपुर रजा अली खां ने संगीत सागर के अलग-अलग खंडों में अपनी लेखन शैली से परिचय कराया है। रजा लाइब्रेरी में मौजूद संगीत सागर के खंडों में उन्होंने तमाम गीतों को लिखा है। नवाब ने जब यह गीत लिखे तब रामपुर रियासत में गीत और संगीत की महफिल सजा करती थी। वैसे तो उन्होंने बसंत और सावन के गीतों को भी सुर लय और ताल के साथ राग संग तैयार किया है, उनकी संगीत कंपोजिंग को भी उस दौर में उन्होंने गीत के साथ ही तैयार किया था।

नवाब ने हिंदी, ब्रज, उर्दू, फ़ारसी, अरबियन शब्दों से सजाकर कई गीत लिखे हैं, जिन्हें पढ़कर आप समझ सकते हैं कि रामपुर नवाब होली से विशेष लगाव रखते थे। उन्हें होली की जानकारी थी इसलिए उसी पर उन्होंने खुद एक नहीं बल्कि कई गीत लिख डाले, जो देश में ही नहीं बल्कि दुनिया भर की पुस्तकों में शामिल किए गए हैं। आप भी अगर उस गीत को पढ़कर गुनगुनाना चाहते हैं तो पढ़िए और गुनगुनाइए।

19 साल तक किया था राज
रजा अली खां 17 नवंबर 1906 को पैदा हुए। छह साल से भी कम उम्र में 11 मार्च 1912 को सकीना बेगम से उनका निकाह हो गया। हालांकि दुल्हन आठ साल बाद रुखसत होकर उनके घर पहुंची थी। चार नवंबर 1920 को उनकी रुख्सती का उत्सव मनाया गया था। इस खुशी में रामपुर में बिजली की रोशनी की व्यवस्था की गई थी। बाद में सकीना बेगम को राजमाता रफत जमानी बेगम से जाना गया। कैसर जमानी बेगम और तलत जमानी बेगम भी नवाब की पत्नियां बनीं। 20 जून 1930 को वह सिंहासन पर आसीन हुए और 26 अगस्त 1930 को उनकी ताजपोशी के मौके पर राज्य में जश्न मनाया गया। उन्होंने 30 मार्च 1949 तक राज किया। 1966 में उनका इंतेकाल हुआ और नजफ (इराक) में दफ्न किया गया। उनके दौर में मस्जिद और मंदिरों को बिजली मुफ्त में दी जाती थी।

इन रागों में लिखकर पिरोया है गीत-संगीत
नवाब रजा अली खां ने राग भोपाली, राग असावरी, ताल तिताला, राज तिलंग, राग परजा, राग तिलक खमोद. राग झंझोरी, राग देस, राग खम्मन, राग भैरवी, राग वृंदावनी, राग सारंग, राग एमन कल्यान, राग बागेश्वरी आदि का उपयोग लेखन शैली में किया है।

यह होली गीत रहे हैं नवाब के हस्तलिखित
-ब्रजबासी कैसी लीला रचाई, फागुन ऋतु मधुवन पै छाई।
रंग गागर भर लाई हर ब्रज लुगाई, मन मोहन टिक टोकन आई।
बंशीधुन सुन सुध बिसराई, ब्रजवास में कैसी लीला रचाई।

आई-आई रंग की बहार खेलो-खेलो साजन नार
हाथन पिचकारी लो संभाल
रंग नदी बहे, प्रेम पवन से उमड़े अबीर गुलाल
फिरकत बांटे जड़ाऊ जोड़े, बने से साजे सुखपाल
रजा पिया खेलें रंग पुत्र का, परजा कहे जिये लाल।

गंगा-जमुनी पिचकारी गोरी ताने मन की उमंग
आई मनोहर बहार खेलो-खेलो साजन नार…
गंगा-जमुनी पिचकारी गोरी ताने मन की उमंग
एक न माने लपक झपक करें तकरार
रामपुर राज की कुंज गली में रजा पिया मचाएं धूम,
बधाई गाए सारा संसार
मतवारे श्याम मोसे करो न ढिठाई
हटो बोलें न तोसें गागर मोरी छपाई

आवौ श्याम लीला रचाएं सत्य संग सै
विष खाए सौतन तुम्हें देख इस ढंग से
शीश पै मुकुट शोभे माथे पै चंदन
रजा पिया खायें खम्माच नयो रंग सै

अब न खेलूं तोसे होरी सइयां मोरे
चुहल करत मोरी बइयां मरोरी
रजा पिया व्यर्थ करो न ढिठाई
तुम ही खेलोगे मोसे होरी, सइयां मोरे

गीत और संगीत का था शौक
नवाब रजा अली खां को गीत और संगीत का बड़ा शौक था। उनके दरबार में फनकारों की बड़ी कद्र थी। वह खुद भी कला प्रेमी थे। सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए सभी धर्मों के त्योहार मनाते। उन्होंने होली गीत भी लिखे, जो उस दौर में बच्चे-बच्चे की जुबान पर रहे। उनके होली गीतों में कन्हैया और गोपियों का भी वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है, श्याम न आए मोहे चित चोरी, खेलत होली चितवन तोरी। मन पिचकारी भर भर आए, सोये हर दे प्रेम जगाए। रजा पिया सुध लो अब मोरी।

होली के रंगों से चार बैत की चुनरिया से रंग लिया
रामपुर दरबार का संगीत और नवाबी रस्में किताब के लेखक नफीस सिद्दीकी ने बताया कि नवाब रजा अली खां ने खुद होली गीतों को ऐसे शब्दों में पिरोया है, उन्होंने अपनी संगीत सागर किताबों के खंडों में एक तरफ गीत लिखा है तो दूसरी ओर राग और ताल भी समझाया है। उस दौर में उनका यह लेखन मौजूदा वक्त के लिए एक बड़ी गीत-संगीत शिक्षा से कम नहीं है।

किले में होता चला आ रहा होली मिलन समारोह
रामपुर रियासत के वंशज नवाब काजिम अली खां उर्फ नवेद मियां कहते हैं कि रामपुर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल रहा है। हमारे पूर्वजों ने गंगा-जमुनी तहजीब को कायम रखा। सभी धर्मों के लोगों को सम्मान मिला। नवाब रजा अली खां ने होली गीत लिखकर यह संदेश दिया कि उनके दिल में हिंदू धर्म के लोगों के लिए भी पूरा सम्मान रहा। किले में होली मिलन समारोह यहां की एक मिसाल है।

नवाब रजा अली खां ने होली के रंगों से चार बैत की चुनरिया से रंग लिया। ढोलक और झांझ पर गाई जाने वाली होली केवल तंबल की संगत पर गाई जाने लगी। नवाब रजा अली ने चार बैत को तबले पर तालबद्ध और रागबद्ध करके नया काम किया। जोकि एक मिसाल से कम नहीं है।– नफीस सिद्दीकी इतिहासकार (नवाब दरबार के संगीत और नवाबी रस्मों के लेखक)

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