उत्तराखंड के पांच मंदिर जहां मन्नत लेकर पहुंचते हैं प्रधानमंत्री से लेकर बॉलीवुड स्टार्स

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देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवों का वास है। यहां के पवित्र धामों की महिमा न केवल देश बल्कि विदेशों तक भी फैली हुई है। यही वजह है कि इन मंदिरों के दर्शन के लिए साल भर देश-दुनिया से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इन मंदिरों के दर्शन करने के उपरांत श्रद्धालु न केवल मन की शांति …

देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवों का वास है। यहां के पवित्र धामों की महिमा न केवल देश बल्कि विदेशों तक भी फैली हुई है। यही वजह है कि इन मंदिरों के दर्शन के लिए साल भर देश-दुनिया से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इन मंदिरों के दर्शन करने के उपरांत श्रद्धालु न केवल मन की शांति बल्कि दुखों से मुक्ति का एहसास भी करते हैं। श्रद्धालुओं की कतार में प्रधानमंत्री से लेकर बॉलीवुड और हॉलीवुड के स्टार भी शामिल हैं। आज हम आपको ऐसे ही पांच मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनके दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं में गजब का उत्साह देखने को मिलता है। इन पांच पवित्र धामों में हिमालय की चोटियों में स्थित बद्रीनाथ मंदिर, केदारनाथ मंदिर हैं तो वहीं नैनीताल में स्थित बाबा नीब करौली का कैंची धाम, नैना देवी मंदिर और जागेश्वर धाम है।

बद्रीनाथ धाम।

बद्रीनाथ मंदिर
यह मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। माना जाता है कि भगवान विष्णु की कृपा पाने का एक आसान रास्ता बद्रीनाथ से होकर जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त श्री हरि विष्णु की कृपा पाने के लिए पूरी श्रद्धा से बद्रीनाथ पहुंचते हैं, भगवान विष्णु उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। ये चार धाम में से एक प्रमुख धाम माना जाता है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, बदरीनाथ की यात्रा के बिना सारी तीर्थयात्राएं अधूरी हैं। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार इस धाम के दर्शनों के लिए पहुंच चुके हैं।

बदरीनाथ एक मनोरम स्थल है। बद्रीनाथ मंदिर से सम्बन्धित मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हो रही थी , तो गंगा नदी 12 धाराओ में बट गईं, इसलिए इस जगह पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से प्रसिद्ध हुई। और इस जगह को भगवान विष्णु ने अपना निवास स्थान बनाया और यह स्थान बाद में बद्रीनाथ कहलाया। बदरीनाथ में नर और नारायण नाम के दो पर्वत शिखर है । इनके बीच पठारी स्थल पर यहां का मुख्य मंदिर स्थित है । मंदिर की पृष्ठभूमि में ऊंची नीलकंठ की चोटी बर्फ से ढंकी हुई दृष्टिगोचर होती है । बदरीनाथ विष्णु का धाम है । मंदिर अलकनंदा के दाहिने तट पर स्थित है । पत्थरों से बने मंदिर की ऊंचाई लगभग 15 मीटर है , जिसके ऊपर तीन स्वर्णकलश चमकते रहते हैं ।

मुख्य मंदिर से नीचे उतरकर अलकनंदा नदी के किनारे एक छोटा कुंड स्थित है जो गर्म जल से भरा हुआ है । जल अत्यधिक गर्म है और यात्री कुछ मिनट ही इसमें स्नान कर पाते हैं । इस जल में नमक भी है । अतः प्राचीनकाल में जब यात्री पैदल यात्रा करके यहां पहुंचते थे तो इस कुंड में स्नान करने से पूरी थकान मिट जाती थी । इसी के पास महिलाओं हेतु अलग तप्त कुंड बना दिया गया है । यह चारों ओर से बंद है , जिससे महिलाएं इसका पूर्ण लाभ ले सकें ।

केदारनाथ धाम।

केदारनाथ मंदिर
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ सबसे ऊंचाई पर स्थित है, यह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में है। भगवान शिव के यहां पर विराजमान होने की भी एक रोचक कथा है, जो भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण से जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिमालय के केदार श्रृंग पर नर-नारायण तपस्या कर रहे थे, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उनको दर्शन दिए। उन दोनों ने भगवान शिव से केदार श्रृंग पर बसने का निवेदन किया, जिस पर भगवान शिव वहीं पर ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी शिव के इस धाम से अपार आस्था जुड़ी है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बैलरूपी भगवान शिव जब अंतर्ध्यान हुए तो उनके धड़ से आगे का हिस्सा काठमाण्डू में प्रकट हुआ, जिससे वे पशुपतिनाथ कहलाए। भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इस वजह से केदारनाथ समेत इन पांच जगहों को पंचकेदार कहा जाता है।

इस मंदिर के कपाट सर्दियों में बंद रहते हैं क्योंकि भारी बर्फबारी के कारण मंदिर बर्फ से ढक जाता है। केदारनाथ के दर्शनों के लिए बैशाखी बाद गर्मियों में इस मंदिर को खोला जाता है। केदारनाथ मंदिर सुबह 4 बजे से ही खुल जाता है लेकिन भोलेनाथ के दर्शन सुबह 6 बजे से ही होता है। दोपहर में 3 से 5 बजे तक कपाट बंद करते हैं, उस दौरान विशेष पूजा होती है।

शाम को 7.30 बजे से 8.30 बजे तक आरती होती है, इससे पहले भगवान पंचमुखी केदारनाथ का विशेष श्रृंगार होता है। दीपावली के बाद पड़वा के दिन जब मंदिर के द्वार बंद होते है, तो उस मंदिर में एक दीपक जला देते हैं। छह माह बाद जब मई में पुजारी वापस केदारनाथ लौटते हैं तो वह दीपक उनको जलता हुआ मिलता है।

कैंची धाम।

बाबा नीबकरौली का कैंची धाम
नैनीताल अल्मोड़ा रोड पर स्थित कैंची धाम बाबा नीम करौली का तपोस्थल बताया जाता है जिन्होंने क्षिप्रा नाम की पहाड़ी नदी के किनारे साल 1962 में कैंची धाम की स्थापना की थी। नैनीताल से 38 किमी दूर भवाली के रास्ते में बाबा नीम करौली का प्रसिद्ध कैंची धाम स्थित है। यह धाम लोगों की अपार आस्था का केंद्र है। कुछ साल पहले यह जगह तब ज्यादा ही सुर्खियों में आई थी, जब फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान इस जगह का जिक्र किया और कैंची धाम आने की बात बताई।

नैनीताल के भवाली-अल्मोड़ा हाईवे पर बने कैंची धाम मंदिर में हर साल देश और दुनिया से लाखों लोग पहुंचते हैं। यहां पर हनुमान जी का मंदिर है। एक चमत्कार के अनुसार, बाबा के धाम में आयोजित भंडारे में एक बार घी की कमी पड़ गईं थी और बाबा के आदेश पर वहां नीचे बहती नदी से पानी भरवाया गया लेकिन प्रसाद बनाते समय वो पानी घी में परिवर्तित हो गया। कहते हैं कि बाबा में दैवीय ऊर्जा थी वो अचानक ही भक्तो के बीच प्रकट होते थे और अचानक ही लुप्त हो उठते थे। चाहे वाहन से पीछा करो या फिर पैदल, वो अचानक ही विलुप्त हो जाते थे।

नैना देवी मंदिर।

नैना देवी मंदिर
नैनीताल का घूमने फिरने के अलावा धार्मिक रूप से भी काफी महत्व है। नैनीताल की नैना झील धार्मिक रूप से काफी पवित्र झील हैं। स्‍कंद पुराण में इसे त्रिऋषि सरोवर भी कहा गया है। नैनी झील कैसे बनी इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं, लेकिन यहां के लोगों की मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि जब अत्री, पुलस्त्य और पुलह ऋषि को नैनीताल में कहीं पानी नहीं मिला तो उन्होंने एक गड्ढा खोदा और मानसरोवर झील से पानी लाकर उसमें भरा। इस झील में बारे में कहा जाता है यहाँ डुबकी लगाने से उतना ही पुण्य मिलता है जितना मानसरोवर नदी में नहाने से मिलता है। यह झील 64 शक्ति पीठों में से एक है।

नैना देवी मंदिर के दर्शन के लिए दूरदराज से लोग आते हैं। नैना देवी के इस मंदिर की मान्यता है कि यदि कोई भक्त आंखों की समस्या से परेशान हैं तो अगर वह नैना मां के दर्शन कर ले तो जल्द ही ठीक हो जाएगा। इसके अलावा यहां तमाम भक्त मां के दर्शन के लिए आते हैं।

जागेश्वर धाम।

जागेश्वर धाम
उत्तराखंड में अल्मोड़ा के पास स्थित जागेश्वर धाम भगवान सदाशिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है। कहा जाता है कि यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा सर्वप्रथम आरंभ हुई। जागेश्वर को उत्तराखंड का पांचवां धाम भी कहा जाता है। जागेश्वर धाम को भगवान शिव की तपस्थली माना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग आठवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इसे योगेश्वर नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर शिवलिंग पूजा के आरंभ का गवाह माना जाता है।पुराणों के अनुसार भगवान शिव एवं सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं, जिसका भारी दुरुपयोग होने लगा।

आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य यहां आए और उन्होंने इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। अब यहां सिर्फ यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं। यह भी मान्यता है कि भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश ने यहां यज्ञ आयोजित किया था, जिसके लिए उन्होंने देवताओं को आमंत्रित किया। कहा जाता है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम इन मंदिरों की स्थापना की थी। जागेश्वर में करीब 250 छोटे-बड़े मंदिर हैं। जागेश्वर मंदिर परिसर में 125 मंदिरों का समूह है। मंदिरों का निर्माण पत्थरों की बड़ी-बड़ी शिलाओं से किया गया है।

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