मुरादाबाद : अल्लाह की रहमत के लिए भूख-प्यास बर्दाश्त कर रहे रोजेदार
मुरादाबाद, अमृत विचार। मंगलवार को बढ़ी गर्मी की तपिश भी रोजेदारों की हिम्मत को हरा नहीं पाई। रोजेदार रमजान के पहले अशरे में अल्लाह की रहमत के लिए 14 घंटे तक भूखे-प्यासे रहकर इबादत में मशगूल हैं। इसके बाद रमजान के दूसरे अशरा माफी और तीसरे अशरा जहन्नुम की आग से निजात का शुरू होगा। …
मुरादाबाद, अमृत विचार। मंगलवार को बढ़ी गर्मी की तपिश भी रोजेदारों की हिम्मत को हरा नहीं पाई। रोजेदार रमजान के पहले अशरे में अल्लाह की रहमत के लिए 14 घंटे तक भूखे-प्यासे रहकर इबादत में मशगूल हैं। इसके बाद रमजान के दूसरे अशरा माफी और तीसरे अशरा जहन्नुम की आग से निजात का शुरू होगा।
मुस्लिम समाज के लिए सबसे अव्वल व मुकद्दस महीना रमजान के तीसरे रोजे पर मंगलवार को सुबह से ही गर्मी ने अपना सितम दिखाया। लेकिन, रोजेदारों पर इसका असर नहीं दिखा। रमजान के पहले अशरे में अल्लाह की रहमत बसरती है। इसलिए रोजेदार भूख-प्यास व गर्मी की तपिश को बर्दाश्त कर रहे हैं। तीन अप्रैल से शुरू हुआ रमजान के महीने में 10 दिन तक पहला अशरा चलता है।
पहला अशरा अल्लाह की रहमतों का कहलाता है। 11वें रोजे से शुरू होने वाला दूसरा अशरा मगफिरत यानी अल्लाह से गुनाहों की माफी मांगी जाती है। वहीं 21वें रोजे से शुरू होने वाला तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से निजात का होता है। जिसमें रोजेदार ज्यादा से ज्यादा इबादत कर जहन्नुम की आग से निजात मांगते हैं। मंगलवार को सुबह से ही रोजेदार मस्जिदों व घरों में इबादत करते नजर आये।
1-रमजान का पहला अशरा
रमजान महीने के पहले 10 दिन रहमत के होते हैं। रोजा नमाज करने वालों पर अल्लाह की रहमत होती है। रमजान के पहले अशरे में मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा दान कर गरीबों की मदद करनी चाहिए। हर एक इंसान से प्यार और नम्रता का व्यवहार करना चाहिए।
2-रमजान का दूसरा अशरा
रमजान के 11वें रोजे से शुरू होकर 20वें रोजे तक दूसरा अशरा चलता है। दूसरा अशरा माफी का होता है। इस अशरे में लोग इबादत कर गुनाहों की माफी मांगते हैं। इस्लामिक मान्यता के मुताबिक, अगर कोई इंसान रमजान के दूसरे अशरे में अपने गुनाहों (पापों) से माफी मांगता है तो दूसरे दिनों के मुकाबले इन दिनों में अल्लाह अपने बंदों को जल्दी माफ कर देता है।
3-रमजान का तीसरा अशरा
रमजान का तीसरा और आखिरी अशरा 21वें रोजे से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29वें या 30वें रोजे तक चलता है। ये अशरा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें जहन्नुम की आग से खुद को सुरक्षित रखना है। इस दौरान हर मुसलमान को जहन्नुम से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए। रमजान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम मर्द और औरतें एहतकाफ में बैठते हैं। एहतकाफ में मुस्लिम पुरुष मस्जिद के कोने में 10 दिनों तक एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं और महिलाएं घर के एक कोने में रहकर ही इबादत करती हैं।
