मुरादाबाद में भी बजा था पंडित शिवकुमार शर्मा का संतूर

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आशुतोष मिश्र, अमृत विचार। मशहूर फिल्म ‘चांदनी’ में मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां हैं… गीत को संगीत देने वाले पंडित शिवकुमार शर्मा का संतूर मुरादाबाद में भी बजा था। वह 1968 में यहां गजल गायक पंडित मदन मोहन गोस्वामी के घर आए थे। इन दोनों के बीच प्रगाढ़ दोस्ती थी, जहां पंडित शिवकुमार के मन …

आशुतोष मिश्र, अमृत विचार। मशहूर फिल्म ‘चांदनी’ में मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां हैं… गीत को संगीत देने वाले पंडित शिवकुमार शर्मा का संतूर मुरादाबाद में भी बजा था। वह 1968 में यहां गजल गायक पंडित मदन मोहन गोस्वामी के घर आए थे। इन दोनों के बीच प्रगाढ़ दोस्ती थी, जहां पंडित शिवकुमार के मन का संतूर बजा था।

मंगलवार को मुंबई में पद्मश्री पंडित शिवकुमार के निधन की जानकारी होते ही गोस्वामी परिवार में शोक की लहर दौड़ गयी। दिवंगत मदन मोहन की जीवनसंगिनी सुनीता गोस्वामी उनकी मौत का समाचार मिलने पर रो पड़ीं। अमृत विचार से बातचीत में उनके बेटे और मशहूर गजल गायक डॉ. विनीत गोस्वामी पंडित शिवकुमार से अपने पारिवारिक रिश्ते बताने लगे।

उन्होंने मां से सुनी बातों के हवाला देकर बताया कि बताया कि 1968 में पंडित जी (शिवकुमार शर्मा) मेरे घर आए थे। तब कपूर कंपनी चौराहा स्थित रेलवे के क्वार्टर में हम सभी रहते थे। वह पिता जी की गायकी और अदायगी के दीवाने थे। मेरे पिता वर्ष 1953-54 में ऑल इंडिया रेडियो के लखनऊ केंद्र से गायकी करते थे। जम्मू (श्रीनगर), शिमला और लाहौर से उनके कार्यक्रमों के प्रसारण हुए। जम्मू के आयोजन में पंडित शिवकुमार से पिताजी की दोस्ती हुई, उसके बाद से दोनों में रागात्मक संबंध बन गए।

विनीत कहते हैं कि 2001 में पिताजी की याद में हमने नाद समर्पण नाम की पत्रिका का प्रकाशन किया, जिसमें पंडित शिवकुमार शर्मा और पुरुषोत्तम दास जलोटा (अनूप जलोटा) ने पत्र लिखकर उसमें श्रद्धांजलि प्रेषित की। 2001 में मुंबई पहुंचने पर हमने पंडित शिवकुमार जी से मां द्वारा बताई गई बातों का जिक्र किया तो वह भावुक हो गए। दिमाग पर जोर देकर मुरादाबाद की यात्रा और पंडित मदन मोहन से अपने रिश्तों का जिक्र करते हुए बताया कि पंडित जी से मेरी गहरी दोस्ती थी। डॉ. विनीत बताते हैं कि वर्ष 2004 में दिल्ली के कई कंसर्ट में मैंने पंडित जी के संतूर के राग सुने।

2017 में नेशनल सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट के कार्यक्रम में मुंबई में उनसे दूसरी बार भी मुलाकात हुई, जिसमें वर्ष 1950-53 में हुईं पुरानी बातों का जिक्र छेड़कर वह भावुक हो गए। उनका निधन भारत के संगीत से संतूर का ठहर जाना है। मुरादाबाद की माटी की ओर से मैं उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं। सच तो यह है एक बार ही सही, लेकिन पंडित शिवकुमार के मन का संतूर मेरे आंगन में भी बजा था।

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