ट्रामा के मरीजों को समय पर उचित इलाज मिल जाये तो बच सकती है जान : प्रो.आर.के. धीमान
लखनऊ। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों की माने तो साल 2014 में सड़क दुर्घटनाओं में करीब 1.25 मिलियन लोगों ने अपनी जांन गवां दी। साल 2030 तक इसे दुनिया भर में विकलांगता के तीसरे प्रमुख कारण के रूप में माना जा रहा है। दुनियाभर में ट्रामा सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय है, यह कहना है एसजीपीजीआई …
लखनऊ। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों की माने तो साल 2014 में सड़क दुर्घटनाओं में करीब 1.25 मिलियन लोगों ने अपनी जांन गवां दी। साल 2030 तक इसे दुनिया भर में विकलांगता के तीसरे प्रमुख कारण के रूप में माना जा रहा है। दुनियाभर में ट्रामा सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय है, यह कहना है एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो.आर के धीमान का।
उन्होंने यह बातें शुक्रवार को एपेक्स ट्रामा सेंटर के सेमिनार हॉल में ट्रामा प्रबंधन पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान कही। उन्होंने कहा कि चोटों के शिकार अधिकांश मरीज युवावस्था के होते हैं, जो समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। बेहतर बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ बेहतर वाहन सुरक्षा सुविधाओं के होने पर भी सड़क दुर्घटना के मामले में इजाफा हो रहा है। ऐसे में ट्रामा के मरीजों को समय पर उचित इलाज मिल जाये तो कई लोगों की जान बचायी जा सकती है।
इस अवसर पर एसजीपीजीआई अस्पताल प्रशासन के विभागाध्यक्ष प्रो.राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं में हो रही जनहानि को देखते हुये प्रारंभिक आघात देखभाल की इस आवश्यकता को सरकार द्वारा भी पहचाना गया और इसमें शामिल स्वास्थ्य कर्मियों के लिए संवेदीकरण पाठ्यक्रम और कार्यशालाओं की योजना भी बनाई गई है।
यही कारण है कि उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से ट्रामा प्रबंधन पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन करने का निर्देश मिला था,इसी के तहत दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें मरीजों के ट्रॉमा केयर के लिए डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, पैरामेडिकल स्टाफ और एम्बुलेंस चालक समेत अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षण दिया गया। जिससे स्वास्थ्य सेवाओं मे लगे स्वास्थ्यकर्मियों को मानक प्रथाओं और प्रोटोकॉल के बारे में प्रशिक्षित किया गया, जो ट्रामा के मरीजों को समय रहते इलाज मुहैया कराने में अहम भूमिका निभायेंगे और कई लोगों को जान बचाने में मददगार साबित होंगे।
