विलुप्त समझा गया पौधा हिमाचल प्रदेश में 188 साल बाद दोबारा मिला

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शिमला। वैज्ञानिकों द्वारा विलुप्त समझी जाने वाली पौधे की Brachystelma attenuatum (ब्रैकिस्टेल्मा एटेनुएटम) नामक प्रजाति हिमाचल प्रदेश के मंडी और हमीरपुर ज़िले में 188 साल बाद दोबारा मिली है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, देहरादून और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला के वैज्ञानिकों ने इसकी पहचान की। इस प्रजाति का पिछला रिकॉर्ड 1835 का है जब ब्रिटिश वनस्पति …

शिमला। वैज्ञानिकों द्वारा विलुप्त समझी जाने वाली पौधे की Brachystelma attenuatum (ब्रैकिस्टेल्मा एटेनुएटम) नामक प्रजाति हिमाचल प्रदेश के मंडी और हमीरपुर ज़िले में 188 साल बाद दोबारा मिली है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, देहरादून और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला के वैज्ञानिकों ने इसकी पहचान की। इस प्रजाति का पिछला रिकॉर्ड 1835 का है जब ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिकों ने इसे हिमाचल में खोजा था।

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के शोधकर्ता डॉ. अम्बर श्रीवास्तव और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से निशांत चौहान द्वारा हिमालय की एक विलुप्त मान ली गई दुर्लभ पादप प्रजाति ब्रैकिस्टेल्मा एटेनुएटम को 188 वर्षों के अंतराल के उपरांत पुन: खोज निकाला है। इस प्रजाति को पहली बार सन् 1835 में ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक जॉन फोर्ब्स रॉयले ने हिमाचल प्रदेश के डूंगी गांव से संग्रहित किया था, जिसके आधार पर एक अन्य वनस्पति शास्त्री रॉबर्ट व्हाइट ने इसका वर्णन किया था। इसकी पहली खोज से लेकर अभी तक इस प्रजाति को दोबारा नहीं देखा गया था, जिसके कारण कई वैज्ञानिकों द्वारा इसको विलुप्त मान लिया गया था।

वर्ष 2020 में पश्चिमी हिमालय में सर्वेक्षण के दौरान निशांत चौहान को हमीरपुर जिले से ब्रैकिस्टेल्मा कुल के कुछ पौधे मिले, जिनको पहचान के लिए भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण देहरादून में तत्कालीन कार्यरत डॉ. अम्बर श्रीवास्तव के पास भेजा गया था। जहां से वैज्ञानिक अध्ययन के उपरांत उन पौधों की पहचान 186 वर्षों से विलुप्त प्रजाति ब्रैकिस्टेल्मा पार्वीफ्लोरम के रूप में की गई। इस विषय में और अधिक सर्वेक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने एक अन्य विलुप्त प्रजाति ब्रैकिस्टेल्मा एटेनुएटम को भी हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर और मंडी जिले से खोज निकाला है। निशांत चौहान हमीरपुर जिले के टिक्कर खतरियां गांव के रहने वाले हैं तथा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं जबकि डॉ. अम्बर श्रीवास्तव लखनऊ के निवासी हैं।

इतने लंबे अंतराल के बाद मिली इस विलुप्त प्रजाति की खोज को इंगलैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रैस द्वारा प्रकाशित विश्व स्तरीय शोध पत्रिका ओरिक्स के जुलाई 2022 के अंक में प्रकाशित किया गया है। हालांकि इस प्रजाति को सर्वप्रथम पिछले वर्ष 2021 मेें ही देखा गया था लेकिन उस दौरान पौधे अपने विकास के अंतिम चरण में थे, जिस कारण उनकी उचित पहचान की पुष्टि कर पाना संभव नहीं हो सका था। इस वर्ष मार्च माह में दोबारा सर्वेक्षण के दौरान उन पौधों का विस्तृत अध्ययन करने के उपरांत उनकी पहचान की पुष्टि की गई है।

शोधकर्ता डॉ. अम्बर श्रीवास्तव ने बताया कि मात्र 2 वर्षों में वैज्ञानिकों द्वारा विलुप्त मान ली गईं 2 दुर्लभ पादप प्रजातियों का मिलना यह दर्शाता है कि इस भौगोलिक क्षेत्र में अभी और अधिक सर्वेक्षणों की आवश्यकता है। संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उन प्रजातियों के प्राकृतिक वास स्थलों का क्षय होने से रोकने के प्रयास किए जाएं तथा उनके अनियंत्रित दोहन पर भी रोक लगाई जाए।

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