गोरखपुर: संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने में प्रेरक की भूमिका निभा रहीं स्नेहलता

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गोरखपुर। महानगर के जाफरा बाजार क्षेत्र की अलवापुर बुलाकीपुर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता स्नेहलता संस्थागत प्रसव के क्षेत्र में प्रेरक की भूमिका निभा रही हैं । वह लाभार्थियों को न केवल इसकी महत्ता बताती हैं बल्कि लाभार्थियों के साथ सरकारी अस्पताल तक पहुंच कर उनका मनोबल भी बढ़ाती हैं। उन्होंने 50 से अधिक गर्भवती के साथ …

गोरखपुर। महानगर के जाफरा बाजार क्षेत्र की अलवापुर बुलाकीपुर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता स्नेहलता संस्थागत प्रसव के क्षेत्र में प्रेरक की भूमिका निभा रही हैं । वह लाभार्थियों को न केवल इसकी महत्ता बताती हैं बल्कि लाभार्थियों के साथ सरकारी अस्पताल तक पहुंच कर उनका मनोबल भी बढ़ाती हैं।

उन्होंने 50 से अधिक गर्भवती के साथ अस्पताल जाकर संस्थागत प्रसव के दौरान उनकी मदद की है। गर्भवती के साथ सामान्य तौर पर आशा कार्यकर्ता ही अस्पताल जाती हैं लेकिन स्नेहलता जिले की एक ऐसी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं जो आशा कार्यकर्ता के साथ खुद भी अस्पताल जाती हैं।

स्नेहलता के कार्यक्षेत्र की रहने वाली 27 साल पुष्पा बताती हैं कि स्नेहलता ने ही गर्भावस्था में उन्हें अस्पताल ले जाकर जांच करवाई थी। जब भी तबीयत खराब हुई जांच के लिए ले गयीं। आशा कार्यकर्ता मधु की हर बात मानने की सलाह दी। पुष्पा को समझाया कि गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त व पोषक आहार लेना है। हरी साग सब्जियों का सेवन करना है।

पोषक आहार भी दिया। जब पहला बच्चा होने को था तो एंबुलेंस भी बुलवाया हालाँकि अस्पताल पहुंचने से पहले ही प्रसव हो गया लेकिन प्रसव के बाद पुष्पा को अस्पताल में भर्ती करवाया गया। स्नेहलता ने पहले बच्चे के बाद परिवार नियोजन का महत्व समझाया और बताया कि दोनों बच्चों में कम से कम तीन साल का अंतर जरूरहोना चाहिए।

पुष्पा ने दोनों बच्चों में सात साल का अंतर किया और जब दूसरी बच्ची हुई तो मायके से ही जिला महिला अस्पताल पहुंचीं। पुष्पा ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को भी रात में अस्पताल बुलवाया और उनकी उपस्थिति में ही प्रसव करवाया। उनके दोनों बच्चे स्वस्थ हैं।

स्नेहलता ने वर्ष 2007 में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के तौर पर शुरूआत की थी। उन्हें जिला प्रशासन द्वारा शक्ति योद्धा सम्मान से सम्मानित भी किया जा चुका है। वह बताती हैं कि क्षेत्र की एक महिला इसलिए सरकारी अस्पताल नहीं जाना चाहती थीं कि उन्हें भ्रांति थी कि उनके यहां अस्पताल में बच्चे का होना सहता ही नहीं है।

उस गर्भवती को प्रेरित करने के लिए उन्होंने एक अन्य लाभार्थी स्वाति का सहयोग लिया। स्वाति ने मन में मिथक पाल चुकी गर्भवती को समझाया कि अस्पताल में सुरक्षित प्रसव होता है और वहां हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध है। जब दोनों लोगों ने प्रेरित किया और स्वाति ने खुद का उदाहरण दिया तो वह संस्थागत प्रसव को तैयार हो गयीं ।

शहरी बाल विकास परियोजना अधिकारी प्रदीप कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को जिला कार्यक्रम अधिकारी हेमंत सिंह के स्तर से यह दिशा-निर्देश है कि वह आशा कार्यकर्ता के साथ कदम से कदम मिला कर कार्य करें। गर्भवती और बच्चों के पोषण और टीकाकरण का विशेष तौर पर ध्यान रखें । साथ ही हर गर्भवती और उसके परिवार को बताएं कि संस्थागत प्रसव ही सुरक्षित है। अस्पताल में प्रसव के बाद 48 घंटे तक जच्चा-बच्चा को भर्ती कर उसकी निगरानी होती है और उनके जीवन की रक्षा की जाती है।

राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-पांच (2019-21) के मुताबिक गोरखपुर में 72.5 फीसदी संस्थागत प्रसव सरकारी अस्पतालों में ही हुआ है। वर्ष 2015-16 के इसी सर्वेक्षण के मुताबिक 52.5 फीसदी प्रसव सरकारी अस्पताल में हुआ था।

पढ़ें-बरेली: संक्रमण काल में संस्थागत प्रसव योजना का बंटाधार, अस्पतालों से तीन गुना घरों में हुए प्रसव

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