विकास यात्रा में अयोध्या का तीर्थत्व बचा ले जाना ही इसका हासिल होगा

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अयोध्या। सप्तपुरियों में प्रथम मानी जाने वाली अयोध्या सरकारी विकास की नई इबारत लिख रही है। इस विकास यात्रा में अयोध्या का तीर्थत्व बचा ले जाना ही इसका हासिल होगा। राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने के बाद अयोध्या को लेकर देश भर में एक बाजार का निर्माण हुआ है। जिसमें तमाम सरकारी और …

अयोध्या। सप्तपुरियों में प्रथम मानी जाने वाली अयोध्या सरकारी विकास की नई इबारत लिख रही है। इस विकास यात्रा में अयोध्या का तीर्थत्व बचा ले जाना ही इसका हासिल होगा। राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने के बाद अयोध्या को लेकर देश भर में एक बाजार का निर्माण हुआ है। जिसमें तमाम सरकारी और निजी प्रोजेक्ट शामिल हैं। इन सबसे इतर अयोध्या की एक खासियत यह है कि उसने खुद को बाजार से अभी तक दूर रखा है।

अयोध्या को लेकर सरकारी विकास से इतर प्रो. मनोज दीक्षित का अलग नजरिया है। प्रो. दीक्षित डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रहे हैं। “यूपी रत्न” से सम्मानित प्रो. दीक्षित पर्यटन विशेषज्ञ के तौर पर भी अपनी अलग पहचान रखते हैं साथ ही साथ दीपोत्सव के जनक भी हैं। अयोध्या की पहचान और विकास के मुद्दे पर उनसे अमृत विचार के लिए इंदु भूषण पांडेय ने बातचीत की। पस्तुत है मुख्य अंश…

अयोध्या का संरक्षण जरूरी है

देखिए जहां तक अयोध्या के संरक्षण की बात है तो सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि अयोध्या आदि पुरी है। यह बसाया हुआ शहर नहीं है, इसकी प्राचीनता और आध्यात्मिकता का संरक्षण हर कीमत पर होना चाहिए। इसी से अयोध्या की पहचान है। बाहर से आने वाला हर व्यक्ति अयोध्या में यही देखने तो आता है। बडी इमारतें, होटल, भव्य निर्माण तो देश के अन्य शहरों में हैं ही।

…तो कैसा होना चाहिए विकास

अयोध्या की अपनी एक अलग पहचान है। इससे यहां के लोग भली भांति परिचित हैं। आज भले ही फैजाबाद का नाम अयोध्या कर दिया गया है, लेकिन एक फर्क महसूस होता है। यही फर्क ही अयोध्या का आकर्षण है। सबसे पहले रामकोट का पूर्ण जीर्णोद्धार होना चाहिए। जिसके जरिए अयोध्या की प्राचीनतम और आध्यात्म को सहेजा जाए। उसके बाद हेरिटेज होटल बने। और उसके बाद नव्य अयोध्या का निर्माण होना चाहिए। जिसमें आधुनिक विकास के तमाम प्रोजेक्ट शामिल हों।

– स्थानीय पहचान सहेजने की आवश्यकता

देखिए, हर शहर अपने मिजाज के लिए जाना जाता है। जैसे बनारस को ही लीजिए, वहां की बिंदास बोलचाल, बनारसी पान, गलियां उस शहर को खास बनाती हैं। ठीक इसी तरह अयोध्या की भी अपनी पहचान हैं। यहां के स्थानीय व्यापार जैसे मूर्ति कला, तुलसी की माला, हवन सामगी आदि को बढावा दिया जाए। इसके अलावा यहां की संस्कृति को सहेजा जाए। उत्सवों के लिए इस नगरी में स्थान और सुविधाओं का विकास होना बेहद जरूरी है।

राम नगरी की दर्शनियता हो

अयोध्या में सरयू नदी का सबसे पुराना पुल नया घाट पर है। यह अब अपनी आयु लगभग पूरी कर चुका है। नया घाट सेतु को अटल सेतु की तर्ज पर बनाया जाना चाहिए। साथ ही लेजर शो की स्थाई व्यवस्था की जाए। कहने का मतलब इसे अयोध्या के सिग्नेचर पुल के रूप में विकसित किया जाए। जहां से आप पूरी अयोध्या निहार सकें।

अयोध्या के आध्यात्म को कैसे समझें

अयोध्या के आध्यात्म ने कभी प्रदर्शन नहीं किया। इस नगरी को बाजार की भाषा समझ में नहीं आती। अयोध्या में हर समय राम नाम का जाप कहीं न कहीं होता रहता है। और यह सब बडी सादगी से होता है, इसे देखने के लिए आपको जाना पडेगा कोई आपको पकड़ कर ले जाने नहीं आएगा।

अयोध्या को सिर्फ मंदिरों की नगरी मान लेना काफी नहीं है। राम के नाम पर पूरे भारत में मंदिर मिलेंगे, लेकिन सब में भिन्नता मिलेगी। यही बात अयोध्या के मठ मंदिरों में भी लागू होती है। हर स्थान का अपना आध्यात्म है जिसे आप सिर्फ महसूस कर सकते हैं।

दीपोत्सव जन का उत्सव कैसे बने

दीपोत्सव की संकल्पना जन के उत्सव को ही ध्यान में रखकर की गई थी। दशहरे से दीपावली तक आयोजन होने चाहिए। अपने प्रेजेंटेशन में भी मैंने इस बात का जिक्र किया था। सबसे पहली बात की इस आयोजन के लिए जनता को आगे आना होगा। दीपोत्सव सरकारी इवेंट सरीखा हो गया है।

यह बात जनमानस को समझनी चाहिए कि अयोध्या किसी भी सरकार से बडी है। जन उत्सव के लिए यदि आप सरकार से मदद की उम्मीद करते हैं तो वह कभी पूरी नहीं की जा सकती है। स्वत स्फूर्त होना पड़ेगा, संत, समाज, युवाओं को आगे आना होगा। अयोध्या को आगे बढ़ना होगा।

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