हथिनी की हत्या से लथपथ ‘जैव विविधता’ का लक्ष्य
बरेली, अमृत विचार। प्रकृति से इंसान का हस्तक्षेप थम जाए। नीला-नीला अंबर दिखने लगता है। स्वच्छ हवा। साफ पानी। घर की मुंढेर से आंगन तक चिड़ियों की चहचहाहट गूंजती है। लाकडाउन में बरेली से पवर्त तो आपने देखे होंगे, न। यह प्रकृति की अद्भुत काया है। जिसे आगे भी निहारना है तो प्रकृति के साथ …
बरेली, अमृत विचार। प्रकृति से इंसान का हस्तक्षेप थम जाए। नीला-नीला अंबर दिखने लगता है। स्वच्छ हवा। साफ पानी। घर की मुंढेर से आंगन तक चिड़ियों की चहचहाहट गूंजती है। लाकडाउन में बरेली से पवर्त तो आपने देखे होंगे, न। यह प्रकृति की अद्भुत काया है। जिसे आगे भी निहारना है तो प्रकृति के साथ छेड़खानी कम करनी होगी।
यह प्रश्न भी लाकडाउन में भी उठा। जब समूचा विश्व लाक रहा। तब निदयां की धारा साफ हो गई। अब लाक से अनलॉक होते ही एक अमानवीय करतूत ने मानवता को शमर्सार कर दिया। शुक्रवार यानी आज जब हम विश्व पयार्वरण दिवस मना रहे हैं। तब इस बार के दिवस की थीम ‘जैव विविधता’ है जो केरल में एक गभर्वती हिथनी के खून से लथपथ हो चुकी है।
उद्भव सोशल वेलयर सोसायटी ने गृहमंत्री अमित शाह को गुरुवार को ई-मेल के माध्यम से भेजे मांग पत्र में हथिनी की हत्या में शामिल लोगों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है। संस्था के विधिक मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता जेएल मौर्य ने अपने पत्र में कहा ‘यदि पशु पक्षियों के प्रति मानव संवेदनाएं खत्म हो जाएंगी तो प्रकृति का वास्तिवक स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा।’
बरेली कॉलेज में वनस्पित विज्ञान के विभागाध्यक्ष डा. आलोक खरे के मुताबिक प्रकृति ने जब मानव जाति को उसकी हद का अहसास है। उस वक्त एक हिथनी को पटाखे खिलाकर मार डालना झकझोरता है। सभ्य समाज में ऐसी घटना असहनीय है। अच्छी बात यह है कि पूरे देश से इस मुद्दे पर संवेदनाएं और आक्रोश सामने आया है। निश्चित रूप से यह संवेदनाएं जीव-जंतुओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
इंसानों ने रखा जीव-जंतुओं की दुनियां में कदम
पर्यावरणविद् डॉ. आलोक खरे जोर देकर कहते हैं कि हम इंसानों ने पशु- पिक्षयों की दुिनयां में कदम रखा। जंगल उनका घर है। उस पर अतिक्रमण किया। पेड़ कांटे। अब, जब वे मैदान में निकल रहे हैं। तब कहते कि बंदर नुकसान कर रहे। उन्हें मारने का आदेश जारी हो जाता। नील गाय फसलें उजाड़ रहीं। टागइर, चीता जंगल से मानव पर हमले करते। यह सब तभी हुआ, जब जीव-जंतुओं के घरों में इंसानों ने अशांति फैलाई।
