उफ्फ…यह कैसा समाजवाद! जहां पार्टी प्रमुख के सामने ही उनके सुरक्षाकर्मी कार्यकर्ता पर बोल देते हैं हमला

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Edited By Amrit Vichar
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लखनऊ। यह कैसा समाजवाद, जहां समाजवादियों की दुर्दशा ही सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को न दिखे। …जरा देखिये अखिलेश जी आपके सामने ही आपके सुरक्षाकर्मी उस कार्यकर्ता का कालर पकड़ रहे हैं, गला दबा रहे हैं जो आपके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा था, न वह पुलिस से डर रहा था, …

लखनऊ। यह कैसा समाजवाद, जहां समाजवादियों की दुर्दशा ही सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को न दिखे। …जरा देखिये अखिलेश जी आपके सामने ही आपके सुरक्षाकर्मी उस कार्यकर्ता का कालर पकड़ रहे हैं, गला दबा रहे हैं जो आपके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा था, न वह पुलिस से डर रहा था, न तेज धूप और गर्मी से, शायद इसी का सिला लाल टोपी लगाये उस कार्यकर्ता को मिला, खूब खातिरदारी की आपके जांबाजों ने।

ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जनता की आवाज क्या उठायेंगे,जो अपने सामने अपने ही कार्यकर्ता की दुर्दशा की अनदेखी करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। यह हम नहीं कह रहे हैं,बल्कि पैदलमार्च पर निकले समाजवादियों के साथ हो रहे सलूक की गवाही खुद तस्वीरें दे रही हैं। इस तस्वीर को देखने के बाद यह सवाल तो उठना लाजमी है।

दरअसल, आज समाजवादी पार्टी के विधायक व विधान परिषद सदस्य पैदल चलकर विधान सभा जा रहे थे। जिसकी अगुवाई खुद अखिलेश यादव कर रहे थे। पार्टी कार्यालय से निकलते ही,कुछ दूर चलते ही पुलिस बल ने सपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने से रोक दिया। जिसके बाद अखिलेश यादव सड़क पर ही धरने पर बैठ गये। कुछ समय धरने पर बैठने के बाद अखिलेश यादव मीडिया से बात करते हैं और कहते हैं कि सरकार जनता की समस्याओं का सुनना नहीं चाहती।

वह बेरोजगारी, मंहगाई, निजीकरण, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था जैसे तमाम मुद्दों पर सरकार पर सवाल उठाते हैं और जनता की समस्याओं के लिए संघर्ष करने की बात कह वापस लौटने लगते हैं, इस बीच वह अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ते हैं कि तभी उनके गाड़ी के पास खड़े एक कार्यकर्ता को उनके ही सुरक्षाकर्मी पहले गर्दन से पकड़ते हैं।

उसके बाद उस शख्स को कालर से पकड़ते हैं और धक्का देकर दूसरी तरफ करते हैं, और यह सबकुछ अखिलेश यादव के सामने होता है, हां यह बात अलग है कि सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की नजर शायद उस समय अपने कार्यकर्ता के तरफ न गई हो या फिर यह भी हो सकता है कि उन्होंने अपने ही कार्यकर्ता की यह दुर्दशा देखकर अनदेखा किया हो।

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