देश में कोरोना वायरस से 60 फीसदी अभिभावकों की आजीविका प्रभावित
नई दिल्ली। देशभर में 60 फीसदी से अधिक माता-पिता या देखभाल करने वालों की आजीविका कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी से पूरी तरह या बुरी तरह से प्रभावित हुई है जिससे उनके बच्चे हाशिये पर पहुंच चुके हैं। वर्ल्ड विज़न इंडिया ने सिविल सोसाइटी ऑर्गेनाइजेशनों और लीडरों से तत्काल अपील की है कि वे भारत के …
नई दिल्ली। देशभर में 60 फीसदी से अधिक माता-पिता या देखभाल करने वालों की आजीविका कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी से पूरी तरह या बुरी तरह से प्रभावित हुई है जिससे उनके बच्चे हाशिये पर पहुंच चुके हैं। वर्ल्ड विज़न इंडिया ने सिविल सोसाइटी ऑर्गेनाइजेशनों और लीडरों से तत्काल अपील की है कि वे भारत के सबसे संवेदनशील लोगों, विशेषकर बच्चों पर कोरोना वायरस (कोविड-19) के घातक दीर्घकालिक प्रभाव पर ध्यान और प्रतिक्रिया दें।
एशिया के सबसे अधिक संवेदनशील बच्चों पर कोरोना के प्रभाव को बेनकाब करते हुए, वर्ल्ड विज़न एशिया पैसिफिक द्वारा जारी की गई। अर्ली रिकवरी एसेसमेंट रिपोर्ट बताती है कि भारतीय परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक, मनोसामाजिक और शारीरिक तनाव ने बच्चों के कल्याण के समग्र पहलुओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है, जिसमें भोजन, पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, आवश्यक दवाएं, स्वच्छता और सैनिटेशन सुविधाओं तक पहुँच, साथ ही साथ बाल संरक्षण और सुरक्षा शामिल है।
पंद्रह वर्षीय शीतल कहती हैं,“हमारे समुदायों में लोग बहुत निराश हो चुके हैं। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि हमें ऐसी निराशा देखने को मिलेगी जो बच्चों को काम करने के लिए मजबूर कर रहा है। इस दौरान बहुत सारे बच्चे बाल श्रम में शामिल हुए हैं। ऐसे कई बच्चे हैं जो सड़कों पर सब्जियां बेच रहे हैं। उनके माता-पिता काम पर नहीं जा पाए हैं और इससे परिवार की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है।
माता-पिता की दुर्दशा देखकर बच्चे निराश हो गए हैं।” देश के 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (दिल्ली और कश्मीर) के 119 जिलों के 5668 परिवारों से इकट्ठा किए गए आंकड़ों के आधार पर अर्ली रिकवरी एसेसमेंट रिपोर्ट में कहा गया है कि 60 फीसदी से अधिक माता-पिता या देखभाल करने वालों की आजीविका कोरोना महामारी से पूरी तरह या बुरी तरह से प्रभावित हुई है।
दिहाड़ी मजदूर, जो इस सर्वेक्षण में सबसे बड़ा खंड हैं, सबसे बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। सरकार की लॉकडाउन उपायों के परिणामस्वरूप हुई आजीविका का नुकसान ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय बन गया है। लगभग 67 फीसदी शहरी माता-पिता / देखभाल करने वालों ने पिछले हफ्तों में नौकरियाँ जाने या आय में कमी की सूचना दी है।
दुनिया भर में 38.50 करोड़ से अधिक बच्चे अत्यधिक गरीबी में रहते हैं। इनमें से, 30 प्रतिशत बच्चे भारत के हैं, जो दक्षिण एशिया में सबसे बड़ी संख्या है। कोरोना के प्रभाव के कारण दशकों से गरीबी और आय असमानताओं के खिलाफ जो लड़ाई चलती आ रही है, अब वह खतरे में पड़ गई है, जिसकी वजह से संभवतः 2020 में भारत का आर्थिक विकास शून्य प्रतिशत पर रुका रह जाएगा, और लाखों बच्चें जोखिम में पड़ जाएंगे।
वर्ल्ड विज़न इंटरनेशनल, दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र के क्षेत्रीय लीडर चेरियन थॉमस ने कहा,“किसी भी आपदा में आमतौर पर महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। कोरोना संकट इससे कोई अलग नहीं है। यह गरीब और संवेदनशील बच्चों को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है – परिवारों के आय स्तर में आई भारी गिरावट के कारण बच्चों को अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं, अपर्याप्त चिकित्सा आपूर्ति मिल रही हैं, हिंसा और शोषण के जोखिम अधिक हैं, शिक्षा तक न्यूनतम पहुँच और पौष्टिक भोजन कम खाने को मिल रहा है।
हमारी रिकवरी एसेसमेंट रिपोर्ट की खोज सभी हितधारकों से समय रहते अपील करती है कि वे इस कठिन परिस्थिति में जितनी हो सके उतनी बेहतर प्रतिक्रिया दें, जो कई देशों में संक्रमण में लगातार वृद्धि के साथ-साथ कई महीनों तक जारी रहे।” रिपोर्ट के नतीजों से पता चलता है कि जितने परिवारों का साक्षात्कार लिया गया था उनमें से 55.1 फीसदी परिवारों को एक दिन में केवल दो समय का भोजन नसीब होता है, जो खर्च उठाने की चुनौतियों के कारण बुनियादी खाद्य आपूर्ति तक सीमित पहुंच का संकेत देता है।
पर्याप्त पानी और सैनिटेशन तक पहुंच एक चुनौती बनी हुई है, जिससे कुपोषण और कोरोना सहित अन्य बीमारियाँ फैलने का जोखिम बढ़ गया है। आय में कमी, स्कूल के अभाव, बच्चों के व्यवहार में बदलाव और संगरोध उपायों के कारण परिवारों पर पड़ने वाले तनाव की वजह से बच्चों को शारीरिक उत्पीड़न और भावनात्मक शोषण सहना पड़ रहा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्तमान स्थिति के कारण 40 फीसदी बच्चे तनावग्रस्त हैं।
हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यक्तिगत देशों पर महामारी से संभवतः दीर्घकालिक गंभीर प्रभाव पड़े हैं, लेकिन वर्ल्ड विज़न इंडिया संबंधित अधिकारियों से गहन सामाजिक-आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान करके सबसे संवेदनशील लोगों को प्राथमिकता देने की अपील करता है।
यह रिपोर्ट संवेदनशील बच्चों की जरूरतों को पूरा करने और उन्हें सभी प्रकार की हिंसा सहित अन्य बीमारियों से बचाने के लिए सरकार, बहु-पार्श्व और कार्यान्वयन भागीदारों के लिए लघु, मध्यम और दीर्घकालिक सिफारिशें प्रस्तुत करता है। एशिया के सबसे अधिक संवेदनशील बच्चों पर कोरोना के प्रभाव को बेनकाब करना अर्ली रिकवरी एसेसमेंट एनालिसिस, नौ एशियाई देशों: बांग्लादेश, कंबोडिया, भारत, इंडोनेशिया, मंगोलिया, म्यांमार, नेपाल, फिलीपींस, श्रीलंका के 335 समुदायों में 26000 से अधिक लोगों के सर्वेक्षण के आंकड़ों का संकलन है।
