हमीरपुर: परेवा के दिन गाय और सूअर को लड़ाने की निभाई गई परंपरा
हमीरपुर, अमृत विचार। दीपावली के बाद परेवा के दिन जहां मौन पूजा हुई। वहीं यहां वर्षों से चली आ रही गाय व सूअर को लड़ाने की परंपरा का भी निर्वहन किया गया। जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ी। खड़ेही लोधन गांव में गाय व सूअर को लड़ाने की वर्षों पुरानी परंपरा कायम है। …
हमीरपुर, अमृत विचार। दीपावली के बाद परेवा के दिन जहां मौन पूजा हुई। वहीं यहां वर्षों से चली आ रही गाय व सूअर को लड़ाने की परंपरा का भी निर्वहन किया गया। जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ी।
खड़ेही लोधन गांव में गाय व सूअर को लड़ाने की वर्षों पुरानी परंपरा कायम है। गांव के लोग सर्वप्रथम सूअर को रस्सी में बांधकर गलियों घसीटते रहे। इसके बाद गाय से लड़ाई कराने का कार्यक्रम हुआ।
गांव के पाहीपाल, अर्जुन यादव, सुरेंद्र यादव, सिद्ध गोपाल, अवधपाल, चंदन पाल, किशोरा यादव ने बताया कि पहले सूअर के एक बच्चे के माथे पर अक्षत व रोली का टीका लगाकर उसे रस्सी से बांध कर लाते हैं और दिवाली का खेल करने वाले लोगों को उसे सौंपते हैं। फिर सूअर को पूरे गांव की गलियों से घसीटते सभी मंदिरों के रास्ते होकर मौन पूजा करने वाले रहुनिया पहुंचते हैं। इसके बाद लोग गाय व सूअर का खेल खिलाने के कार्य शुरू करते हैं। जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ एकत्र होती है।
इसलिए निभाई जाती है ये परम्परा
गोविंद इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य बलराम सिंह राजपूत ने बताया कि पूर्वज बताते थे कि गाय व सूअर लड़ाई की परंपरा पुराने जमाने से चली आ रही है। इसे बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है। पूर्वजों के अनुसार एक बार सूअर के रूप में एक दैत्य ने पृथ्वी पर यदुवंशियों के ऊपर घोर अत्याचार किया। भगवान कृष्ण ने गौ का रूप धारण कर अपने खुरों से उसका वध कर दिया। तभी से परंपरा चली आ रही है। इसमें गाय के साथ सूअर की भी पूजा की जाती है। इसके बाद मौन पूजा का कार्यक्रम होता है।
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