रामपुर : पारंपारिक तरीके से डोली में विदा कराई दुल्हन, नई पीढ़ी के लिए ये प्रथा अजूबा दिखाई दी

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Edited By Amrit Vichar
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रामपुर/स्वार, अमृत विचार। एक युवक ने अपनी शादी में लगभग लुप्त हो चुकी डोली प्रथा को जीवित कर दिया। उसकी तमन्ना थी कि जब दूल्हा बनकर ससुराल पहुंचेगा तो डोली में बैठाकर अपनी दुल्हन को घर लायेगा। बुधवार की रात जब डोली में दुल्हन की विदाई हुई तो लोगों में पुरानी परपंरा को लेकर खूब चर्चा हुई। नई पीढ़ी के लिए ये प्रथा अजूबा दिखाई दी ओर डोली को निहारते नजर आये। 

पुराने जमाने से चली आ रही पालकी ओर डोली का अस्तित्व धीरे धीरे समाप्त हो गया। अब लग्जरी कार का युग चल पड़ा है। लोग हेलिकॉप्टर से दुल्हन को विदा करवा कर ले जा रहे है। लगभग चार दशक पूर्व शादी विवाह में डोली या पालकी ही दुल्हन की सवारी हुआ करती थी। अब नई पीढ़ी शायद डोली शब्द को ही भूल चुकी है। बुधवार की रात जब डोली में सवार होकर एक दुल्हन अपनी ससुराल के लिए विदा हुई तो लोग आश्चर्य से डोली को निहारते ओर हैरत से देखते हुए दिखाई दिए । तहसील क्षेत्र के तालकपुर भोट निवासी हफीज शब्बन अली के बेटे जावेद अली की बरात नगर के मोहल्ला अगलगा निवासी अली जान के यहां पहुंची थी। निकाह में जब दूल्हा व दुल्हन ने एक दूसरे को कबूल कर लिया। तब विदाई धूमधाम से हुई।

 लेकिन दुल्हन की विदाई लग्जरी कार में नही बल्कि दुल्हन को डोली मे बैठाकर विदाई हुई। इसके लिये बाकायदा कहार बुलाये गये थे। कहारों ने जब डोली उठाई तो यह क्षेत्र मे चर्चा का विषय बन गया। हेलिकॉप्टर से दुल्हन की विदाई नये दौर में दशकों पुरानी परपंरा को जीवित देख लोग दंग रह गए। नई पीढ़ी के लोग डोली निहारते देखते रहने के साथ उन्हें अजूबा दिखाई दिया। नगर समेत ग्रामीण क्षेत्रों में दशको पुरानी परपंरा डोली में दुल्हन की विदाई होने की लोगो मे चर्चा होती रही।


दशकों पूर्व शान समझी जाती थी डोली
स्वार। लगभग चालीस वर्ष पूर्व डोली या पालकी में दुल्हन की विदाई शान समझीं जाती थी। लग्जरी कारे एवं संसाधन ने होने के कारण बरात भी बैलगाड़ियों से जाती थी। तब कहारो का अपना अलग महत्व होता था। दूरी के हिसाब से कहार बुलाये जाते थे। आमतौर पर कम से कम तीन या पांच कहार तय किये जाते थे। जिससे की कांधे बदलकर दुल्हन को आसानी से ससुराल तक ले जाया जा सके।

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