कार्बन उत्सर्जन में अमीर देशों के ‘ऐतिहासिक योगदान’ को भुलाने के प्रयास

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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नई दिल्ली। अमीर देश मिस्र में जारी संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन (सीओपी27) के मसौदे में ‘प्रमुख उत्सर्जक’ और ‘शीर्ष उत्सर्जक’ जैसी भाषा शामिल करने का दबाव बना रहे हैं, जो भारत को स्वीकार्य नहीं है। भारतीय प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य ने गुरुवार को यह जानकारी दी। उन्होंने नाम न जाहिर करने की शर्त पर ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि विकसित देश चाहते हैं कि सिर्फ अमीर देश ही नहीं, जो ऐतिहासिक रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं, बल्कि सभी प्रमुख उत्सर्जक, खासकर भारत और चीन जैसे शीर्ष-20 उत्सर्जक वैश्विक तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस पर सीमित रखने के लिए अपने उत्सर्जन स्तर में भारी कटौती करें। 

शुक्रवार को शिखर सम्मेलन के समापन से पहले आम सहमति कायम करने की कोशिशों के तहत सभी पक्षों के प्रतिनिधि मसौदे पर चर्चा और पुनर्विचार कर रहे हैं। एक ब्लॉग पोस्ट में चर्चा का विवरण साझा करते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन में ‘जलवायु से जुड़े मुद्दों पर कुछ मौलिक दृष्टिकोण को लेकर विचारों में भिन्नता’ से प्रमुख मुद्दों पर प्रगति अच्छी नहीं रही है। उन्होंने कहा कि जिन प्रमुख मुद्दों का समाधान नहीं हो सका है, उनमें शमन कार्य से संबंधित कार्यक्रम, दूसरी आवधिक समीक्षा, अनुकूलन पर वैश्विक लक्ष्य और हानि एवं क्षति जैसे मुद्दे शामिल हैं। यादव ने कहा कि ‘इक्विटी’ और ‘कॉमन बट डिफ्रेंशिएटेंड रिस्पॉन्सिबिलिटीज एंड रिस्पेक्टिव केपेबिलिटीज’ (सीबीडीआर-आरसी) के सिद्धांतों को ‘भुलाने या नजरअंदाज करने का स्पष्ट प्रयास’ किया जा रहा है। 

इक्विटी का मतलब यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में प्रत्येक देश का योगदान वैश्विक आबादी में उसकी हिस्सेदारी के बराबर होना चाहिए। वहीं, सीबीडीआर-आरसी सिद्धांत कहता है कि जलवायु परिवर्तन का समाधान निकालने का दारोमदार प्रत्येक देश पर है, लेकिन प्राथमिक जिम्मेदारी विकसित देशों को संभालनी चाहिए, क्योंकि वे अतीत और वर्तमान में अधिकांश ग्रीनहाउस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। यादव ने कहा, “इस बात पर जोर देने के प्रयास किए जा रहे हैं कि पेरिस जलवायु समझौते के तहत सम्मेलन के सिद्धांतों का पालन करने की जरूरत नहीं है। मैंने भारत की स्थिति स्पष्ट की है कि इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। विकसित देशों के ऐतिहासिक योगदान और उनकी जिम्मेदारियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।” पर्यावरण मंत्री ने कहा कि भारत नयी श्रेणियां, ‘मसलन प्रमुख उत्सर्जक, शीर्ष उत्सर्जक आदि’ बनाने और उन श्रेणियों के आधार पर बढ़ी हुई जिम्मेदारियां निर्धारित करने के प्रयासों का समर्थन नहीं कर सकता, जिनका सम्मेलन और पेरिस समझौते में कोई आधार नहीं है। 

उन्होंने कहा कि मसौदे में 2020 से पहले के लक्ष्यों में अंतर का जिक्र अहम है, क्योंकि इससे 2020 के बाद की अवधि में विकासशील देशों पर शमन जिम्मेदारियों का अन्यायपूर्ण तरीके से हस्तांतरण हुआ है। यादव ने कहा, “वैश्विक तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस पर स्थिर रखने के प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए विकसित देशों से जलवायु वित्त के तेजी से आवंटन की आवश्यकता होगी, जिन्होंने बिना किसी अनुपात के वैश्विक कार्बन बजट का इस्तेमाल किया है।” जलवायु वार्ता के पहले सप्ताह के दौरान भी भारत ने अन्य विकासशील देशों के समर्थन से ‘शमन कार्य कार्यक्रम’ पर चर्चा के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड के सभी शीर्ष 20 उत्सर्जकों पर ध्यान केंद्रित करने के अमीर देशों की कोशिशों को अवरुद्ध किया था। 

पर्यावरण मंत्री ने कहा कि कार्रवाई के लिए किसी विशिष्ट संसाधन या क्षेत्र या गैस को नहीं चुना जा सकता है और यूरोपीय संघ (ईयू) ने इस पहलू पर भारत का समर्थन किया है। भारत ने शनिवार को प्रस्ताव दिया था कि वार्ता केवल कोयला ही नहीं, बल्कि सभी जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल ‘चरणबद्ध’ तरीके से कम करने के निर्णय के साथ समाप्त होनी चाहिए। ईयू के उपाध्यक्ष फ्रैंस टिम्मरमैन्स ने मंगलवार को मीडिया से कहा था कि अगर सभी जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल ‘चरणबद्ध’ तरीके से कम करने का भारत का प्रस्ताव ‘ग्लासगो में पहले से बनी सहमति से परे है’ तो यूरोपीय संघ इसका समर्थन करेगा। उन्होंने कहा था कि ‘इससे कोयले का इस्तेमाल चरणबद्ध तरीके से घटाने के हमारे प्रयासों से ध्यान नहीं भटकना चाहिए, जिस पर हम पिछले साल सहमत हुए थे।’ 

यादव ने कहा कि मसौदे में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और समर्थन के संबंध में एक मजबूत भाषा शामिल किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “कई नयी प्रौद्योगिकियों के बदले लिया जाने वाला हरित प्रीमियम अब भी काफी अधिक है और हमें कार्यान्वयन के संबंध में तकनीक के साथ-साथ वित्त के क्षेत्र में मौजूद अंतर की वजहों को पहचानने के लिए मसौदा फैसले की जरूरत है।” यादव ने कहा कि विकासशील देशों को कार्यान्वयन (वित्त, प्रौद्योगिकी, क्षमता निर्माण) के लिए सहयोग देने में विफलता पेरिस समझौते के तहत एक प्रणालीगत विफलता है, जो भावी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बाधा बनी हुई है। उन्होंने कहा कि मसौदा निर्णय में अनुकूलन, हानि और क्षति से जुड़े तत्वों को दृढ़ता से प्रतिबिंबित किया जाना चाहिए, जिसमें 2025 तक कम से कम दोगुने अनुकूलन वित्त की आवश्यकता और राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं के लिए धन उपलब्ध कराना शामिल है। 
 

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