चीन की चिंता
भारत और ताइवान को चीन की निरंकुशता से खतरा है। वहीं भारत-ताइवान के बीच बढ़ते संबंधों को लेकर चीन की चिंता भी बढ़ गई है। पिछले दिनों चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की नेशनल कांग्रेस में ताइवान का मुद्दा प्रमुखता से उठा। हिंद प्रशांत इलाके में और खासकर ताइवान पर चीन के आक्रामक रवैये को देखते हुए स्थिति कभी भी बदल सकती है। भारत को इसके लिए तैयार रहना होगा।
जानकारों के मुताबिक अब वक्त आ गया है कि भारत और ताइवान रणनीतिक साझेदारी करें। व्यापार और तकनीकी सहयोग बढ़ाने के साथ इसकी शुरुआत की जा सकती है। ताइवान के पास पूंजी और टेक्नोलॉजी है, जबकि भारत के पास बाज़ार के साथ-साथ बड़ी संख्या में मानव संसाधन उपलब्ध है। भारत और ताइवान के पास एक मज़बूत एवं बेहतर आर्थिक और व्यापार ढांचा है। भारत का विकास ताइवान के लिए आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही तरह का असाधारण मौक़ा है। भारत-ताइवान के मध्य द्विपक्षीय हितों को लेकर पारस्परिक झुकाव के अलावा चीन में इस बात का भी डर व्याप्त है कि भविष्य में कुछ बाहरी कारक भी भारत-ताइवान सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर सकते हैं।
चीन इसको लेकर यूएस-जापान फैक्टर के बारे में सबसे ज्यादा चिंतित है। हालांकि यूक्रेन-रूस संघर्ष ने उसे अपनी सोच बदलने को विवश कर दिया है। दरअसल चीन हमेशा से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए सिरदर्द रहा है। पश्चिमी देशों के अलावा पड़ोसी देशों की भी चिंता है कि उससे कैसे निपटा जाए। यूरोपीय संघ ने तीन साल पहले ही चीन को पार्टनर, प्रतियोगी और व्यवस्थागत प्रतिद्वंद्वी बताया था।
अब ताइवान अपनी अर्थव्यवस्था को अपनी शर्तों पर विकसित करने के लिए अपनी नीति के साथ सामने आया है। चीन में इसे कुछ हद तक पसंद नहीं किया गया है। ताइवान की विदेश और आर्थिक नीति का रुख भारत की ओर होगा। चीन के प्रति भारत की गहरी शत्रुता ताइवान के मौज़ूदा रुख़ को मज़बूती देती है। गौरतलब है कि भारत दुनियां को एकल वृहत वैश्विक परिवार के रूप में देखता है।
आज के भारत के पास वैश्विक फलक पर अपनी नई आवाज है जिसकी जड़ें घरेलू वास्तविकताओं एवं सभ्यतागत लोकाचार में निहित होने के साथ ही स्वयं के प्रमुख हितों की खोज में गहराई से जमी हैं। भारत अपने निर्णय स्वयं लेता है और इसकी स्वतंत्र विदेश नीति किसी भयादोहन या दबाव के अधीन नहीं लाई जा सकती। भारत की विदेश नीति को विकास के लिए कूटनीति के इस पहलू पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहां आर्थिक कूटनीति को राजनीतिक कूटनीति के साथ एकीकृत किया जाए।
