टकराव ठीक नहीं

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Edited By Amrit Vichar
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कॉलेजियम को लेकर न्यायपालिका और कार्यपालिका में टकराव को किसी भी तरह से ठीक नहीं माना जा सकता। दुर्भाग्य से लोकतंत्र के दोनों स्तंभ न केवल आमने-सामने आ गए हैं बल्कि कोई बीच का रास्ता निकालने पर सहमत नहीं दिखते हैं। न्यायपालिका इस सिस्टम को सही ठहरा रही है। वही कार्यपालिका को इसमें विसंगतियां ही नहीं बल्कि पारदर्शिता का अभाव भी दिख रहा है।

वैसे यह भी ताज्जुब की बात है कि एक समय जो न्यायपालिका इस सिस्टम में सुधार पर जोर दे रही थी आज वही उसमें किसी भी तरह के संशोधन के खिलाफ है। अलबत्ता उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा के शीतकालीन सत्र में पहले ही दिन अपने संबोधन में एक बार फिर इस मुद्दे पर चर्चा की बात कही।

उन्होंने 2014 के 99वें संविधान संशोधन का जिक्र किया जो कॉलेजियम में सुधार के लिए था जिसे न्यायपालिका द्वारा अक्टूबर 2015 में ख़ारिज कर दिया था। जबकि नियमतः न्यायपालिका को उसे संशोधन के लिए सरकार के पास भेजना चाहिए। इस पर आगे बहस न होना धनखड़ की नजर में संसदीय संप्रभुता से गंभीर समझौता और जनादेश का अपमान है। आसार ऐसे नहीं लगते कि यह मसला जल्द सुलझ सकेगा।

दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं। हो सकता है कि न्यायपालिका सही हो फिर भी इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता। क्योंकि पारदर्शिता की सीख न्यायपालिका देश की हर संस्था को देता रहा है। मसलन चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर यह कहकर उसने सवालिया निशान लगा दिया था कि इस चयन में पारदर्शिता का अभाव है।

जब अन्य सभी नियुक्तियों और व्यवहार में न्यायपालिका पारदर्शिता की बात कहती है तो अपने चयन के सिस्टम में पारदर्शिता के खिलाफ क्यों है? माना जा रहा है कि इस सिस्टम की खामियां भाई-भतीजावाद का माहौल तो बनाती ही हैं, गैर जिम्मेदारी की भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

बहरहाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह आवश्यक है कि सभी स्तंभों में सामंजस्य बना रहे। क्योंकि लोकतंत्र को बरकरार रखने वाली संस्थाओं में टकराव देश में अस्थिरता की स्थिति पैदा करता है। अत: इस मसले पर कोई बीच का रास्ता निकाला जाए। ताकि उक्त संस्थानों के प्रति लोगों का भरोसा बना रहे।

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