बरेली: दो वक्त की रोटी और जिस्मफरोसी की मिलती है आधी कमाई
संजय शर्मा, बरेली। गरीबी, लाचारी, बेबसी, मजबूरी जैसे शब्द रोज हमारे आसपास से गुजरते हैं। कुछ मुस्कुराते हुआ खुद को गरीब कहता है तो कोई खुद को बेबस बताता है। कोई मजबूरी बताकर काम चलाता है लेकिन विधायक के भाई के शादी हॉल से पकड़ी गई कुछ लड़कियों का दर्द इन शब्दों से कहीं ज्यादा …
संजय शर्मा, बरेली। गरीबी, लाचारी, बेबसी, मजबूरी जैसे शब्द रोज हमारे आसपास से गुजरते हैं। कुछ मुस्कुराते हुआ खुद को गरीब कहता है तो कोई खुद को बेबस बताता है। कोई मजबूरी बताकर काम चलाता है लेकिन विधायक के भाई के शादी हॉल से पकड़ी गई कुछ लड़कियों का दर्द इन शब्दों से कहीं ज्यादा था। उनकी आंख के आंसू उनकी मजबूरी के आगे सूख गए थे। उनके चेहरे की खामोशी उनके पीछे पहाड़ जैसी चिंता छुपाए थी। महिला दरोगा और सिपाहियों को पहली बार किसी की लड़की होना गुनाह लग रहा था।
छानबीन में पता चला कि पकड़े गए सेक्स रैकेट में कुछ लड़िकयां अपने शौक के लिए जिस्मफरोसी के धंधे में आई थी। लेकिन कुछ की ऐसी बेबसी थी की वो इसके शिवा कुछ नहीं कर सकती थीं। लाकडाउन ने रोजगार छीना तो दो वक्त की रोटी खाने के लिए परिवार के लोगों ने दलालों के हाथों बरेली तक भिजवा दिया था। यहां उन्हें सुबह और शाम की खुराक मिलती थी और जो पैसा वो जिस्म बेचकर कमाती थीं। उसका आधा उनसे दलाल ले लिया करते थे।
कोलकाता और पश्चिम बंगाल से बरेली आई लड़कियों के अरमान तो मर ही गए थे सिर्फ शरीर जिंदा था। पकड़ी गईं लड़कियों की जिस्मफरोसी से उनके परिवार में अन्य लोगों फांका हो पाता है। उन्हें ये काम कब तक करना होगा इस बात को सोचकर ही उनकी रूह कांप जाती है। अगर वह जिस्म न बेचे तो दलाल रोटी खिलाने से मना कर देता है। कुछ अपने बच्चे को गोद में लिए तेजाब के आंसू पीकर बच्चे के लिए दूध का इंतजाम कर रही है।
“पकड़ी गईं लड़कियों कुछ तो बहुत ही गरीब है। उन्होंने वहां किसी से काम मांगा तो दलाल ने यहां के दलालों के नंबर दे दिए। काम की तलाश में यहां आ गई और सेक्स वर्कर बनकर रह गई।” -शितांशु शर्मा, इंस्पेक्टर बारादरी
