बरेली: भरण-पोषण के मुकदमे के बावजूद दूसरी शादी को नहीं तैयार महिलाएं, शोध में खुलासा
बरेली, अमृत विचार। ससुराल में जुल्म सहने और दूसरी महिला से संबंध होने की जानकारी के बावजूद महिलाएं पति का घर नहीं छोड़ना चाहती हैं। महिलाओं को भरण-पोषण की जानकारी नहीं है और जिन्हें है वह भरण-पोषण का मुकदमा डालने के बाद भी दूसरी शादी करने को तैयार नहीं हैं। एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय की विधि की पीएचडी की छात्रा लक्ष्मी के रुहेलखंड परिक्षेत्र में किए गए शोध में ये तथ्य सामने आए हैं। सोमवार को लक्ष्मी ने अपना शोध प्रस्तुत किया। इसके अलावा विनीता यादव ने भी शोध प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने बताया कि करीब 50 फीसदी घरेलू कामगार सप्ताह में सातों दिन काम करते हैं।
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विधि विभाग अध्यक्ष डॉ. अमित सिंह के निर्देशन में लक्ष्मी देवी ने वर्ष 2015 में पीएचडी में प्रवेश लिया था। उन्होंने धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत महिलाओं का भरण पोषण का अधिकार उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड परिक्षेत्र के संदर्भ में सामाजिक विधिक अध्ययन टॉपिक पर अपना पीएचडी प्रस्तुतीकरण दिया। उन्होंने बरेली, रामपुर, मुरादाबाद, अमरोहा, बिजनौर, शाहजहांपुर, बदायूं सहित सात जिलों में एक हजार महिलाओं के साक्षात्कार करके भरण पोषण के मुकदमों के बारे में जानकारी लेकर अपना रिसर्च प्रस्तुत किया।
शोध में तथ्य निकलकर आए कि लगभग 76 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि उनका विवाह प्रथाओं के अनुसार हुआ है। सिर्फ 0.9 प्रतिशत महिलाओं ने यह माना कि उनका विवाह विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत हुआ। इसके अलावा दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 के तहत 31 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं को और 69 प्रतिशत हिंदू महिलाओं को भरण पोषण की प्राप्ति हो रही है और 23 प्रतिशत महिलाओं ने यह माना कि उनके पति का किसी अन्य महिला से संबंध हैं, इसीलिए भरण पोषण का मुकदमा चल रहा है।
लगभग 62 फीसदी महिलाओं को ही भरण पोषण की जानकारी है। करीब 73 प्रतिशत महिलाएं भरण पोषण के मुकदमे के बावजूद दूसरी शादी नहीं करना चाहती हैं। लक्ष्मी देवी ने भरण पोषण के मुकदमों से संबंधित सुझाव दिए हैं कि सरकार को दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन करके भरण पोषण से संबंधित मुकदमों को एक वर्ष के भीतर निर्धारित कर देना चाहिए। ऐसी महिलाएं जिनके पास पर्याप्त साधन नहीं हैं, उन्हें एनजीओ के माध्यम से मुकदमा लड़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और एनजीओ के तरफ से ही मुकदमे का खर्चा बहन करना चाहिए।
62 फीसदी घरेलू कामगार वेतन पाते हैं कम
वहीं विनीता यादव ने सामाजिक कल्याण श्रम विधिक के अंतर्गत घरेलू महिला श्रमिकों (मेड) की सुरक्षा एक सामाजिक अध्ययन विषय पर अपनी प्री पीएचडी प्रस्तुत की। जिसके अंतर्गत उन्होंने भारत में श्रम विधियों में घरेलू महिला श्रमिकों की सुरक्षा और होने वाली समस्याओं के विषय में अपना शोध कार्य किया। इसमें उन्होंने बरेली जिले के अंतर्गत विविध प्रश्नावली हूं के जरिए घरेलू कामगारों का अध्ययन किया।
उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि 54-50 प्रतिशत कामगार सप्ताह के सातों दिन कार्य करते हैं और इसमें से 88 प्रतिशत कामगार अनपढ़ हैं। इसके अलावा लगभग 62 प्रतिशत अपना वेतन कम पाते हैं। उन्होंने बताया कि सभी कामगारों का पुलिस वेरिफिकेशन जरूरी है और घरेलू कामगारों का भी पंजीकरण होना अनिवार्य किया जाए।
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