Mahashivratri 2023: शिवालयों में उमड़ा भक्तों का सैलाब, हर-हर महादेव, बम-बम भोले के नारों से गूंजे उठे मंदिर

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

Mahashivratri 2023 बांदा में मंदिरों में उमड़ी भक्तों की भीड़।

Mahashivratri 2023 बांदा के बांबेश्वर, नीलकंठेश्वर समेत तमाम मंदिरों में सुबह से ही भोले के भक्तों की भीड़ उमड़ रही। हर-हर महादेव, बम-बम भोले और ॐ नमः शिवाय के नारों से मंदिर गूंज उठे।

बांदा, अमृत विचार। महाशिवरात्रि पर्व पर बांबेश्वर और नीलकंठेश्वर मंदिर में ॐ नमः शिवाय और बम-बम भोले आदि शिव मंत्र गूंज रहे हैं। शिवालयों में भोर से ही लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं।महाशिवरात्रि पर्व पर रात्रि के चार प्रहरों में हर प्रहर में शिव पूजा की जाएगी। शिवलिंग पर बेल पत्र, पान, सुपाड़ी, रोली, मौली, चंदन, लौंग, इलायची, दूध, दही, शहद, धतुरा आदि अर्पित किया जाएगा।

पौराणिक मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर भगवान शिव व माता पार्वती का विवाह हुआ था। इस दिन भगवान शिव और पार्वती की विधि-विधान से पूजा होती है। कैलाशपुरी स्थित बांबेश्वर मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। बांबेश्वर पहाड़ पर ऊंची चट्टानों के बीच बामदेश्वर मंदिर शिव भक्तों का आस्था केंद्र होने के साथ ही प्राकृतिक रूप से भी आकर्षक है। इसे रामायण कालीन बताया गया है। कहा जाता है कि महर्षि बामदेव की तपस्या से यह शिवलिंग उत्पन्न हुआ था।

Mahashivratri News

वामदेव का तपस्या स्थल पहाड़ पर ही था। किंवदंती है कि वनवास के लिए चित्रकूट जाते समय श्रीराम और सीता ने बामदेवेश्वर पर्वत में महर्षि बामदेव का आशीर्वाद लिया था और शिवलिंग की पूजा की थी। वह कई दिन यहां रहे। यह शिवलिंग चट्टानों के बीच 5 मीटर गुफा में है। कई अन्य मंदिर भी हैं। खास बात यह भी है कि मंदिरों में शिवलिंग के पास नंदी की मूर्ति होती है, लेकिन यहां नहीं है। यहां अखंड दीपक शुरू से ही जल रहा है।

महाशिवरात्रि पर तड़के से देर रात तक हजारों महिला पुरुष गुफा तक पहुंचने के बाद शिवलिंग पर जलाभिषेक व दुग्धाभिषेक कर पूजा अर्चना के लिए लंबी लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करेंगे। मंदिर के पुजारी पुत्तन तिवारी के मुताबिक रामायण काल में इस शिवलिंग का वर्णन है। उधर, ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर के शिवलिंग का दुर्लभ और दिलचस्प इतिहास है। चट्टानों को काटकर बनाई गई प्रतिमाएं और शिल्प कृतियां बेहद आकर्षक हैं।

वास्तु शिल्प की दृष्टि से यह मंडप चंदेल शासकों की अनोखी कृतियां हैं। मंदिर के ऊपर पानी का ऐसा प्राकृतिक स्त्रोत है जो कभी नहीं सूखता। इससे शिवलिंग का जलाभिषेक कुदरती तौर पर निरंतर होता रहता है। चतुर्थ शताब्दी में यहां नागों ने नीलकंठ महादेव का मंदिर बनवाया। चंदेल काल से ही यहां पूजा-अर्चना होती चली आ रही है। श्रद्धालु बताते हैं कि शिव मूर्ति कंठ चट्टान में होने के बावजूद स्पर्श करने से मुलायम प्रतीत होता है।

संबंधित समाचार