अच्छी औषधियां उपलब्ध कराने के लिए बना था फार्मेसी एक्ट : सुनील यादव

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Edited By Amrit Vichar
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लखनऊ, अमृत विचार। आजादी के बाद 4 मार्च 1948 को भारत में फार्मेसी एक्ट भारत की संसद ने पारित कर देश में लागू किया गया था। शनिवार यानी 4 मार्च 2023 को फार्मेसी एक्ट का 75 वर्ष पूरा हुआ है । यह क्षण भारत के सभी फार्मासिस्टों के साथ ही उन लाखों फार्मेसी छात्रों के लिए एक पर्व की तरह है जो डिप्लोमा से लेकर पीएचडी कर रहे हैं। भारत सरकार ने देश की जनता को अच्छी औषधियां उपलब्ध कराने, फार्मेसी के क्षेत्र में अच्छी शिक्षा प्रदान कर प्रशिक्षित लोगों द्वारा ही फार्मेसी प्रैक्टिस किए जाने की व्यवस्था समेत अन्य उद्देश्यों को लेकर फार्मेसी एक्ट का किया था । फार्मेसी एक्ट वास्तव में देश में फार्मेसी प्रैक्टिस के कवच के रूप में, फार्मेसिस्टों की सुरक्षा कवच के रूप में, आम जनता के लिए सुरक्षित औषधियों के कवच के रूप में स्थापित है। यह कहना है उत्तर प्रदेश स्टेट फार्मेसी कौंसिल के पूर्व चैयरमैन और फार्मासिस्ट फेडरेशन के अध्यक्ष सुनील यादव का।

फार्मेसी इंस्पेक्टर के तैनाती की उठी मांग

इस अवसर पर शनिवार को एक वेबीनार आयोजित कर स्टेट फार्मेसी कौंसिल के पूर्व चैयरमैन और उत्तर प्रदेश फार्मासिस्ट फेडरेशन के अध्यक्ष सुनील यादव, संयोजक एवं फेडरेशन ऑफ इंडियन फार्मेसिस्ट ऑर्गेनाइजेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के के सचान, महामंत्री अशोक कुमार, वरिष्ठ उपाध्यक्ष जे पी नायक , उपाध्यक्ष सरफराज अहमद, राजेश सिंह, ओ पी सिंह, जी सी दुबे, यूथ विंग के अध्यक्ष आदेश, पी एस पाठक, जय सिंह सचान , आर आर चौधरी, कपिल वर्मा, सहित विभिन्न पदाधिकारियों ने देश के सभी फार्मासिस्ट को बधाई दी । सुनील यादव ने कहा कि राज्य सरकार से अपेक्षा है कि एक्ट का पूरी तरह परिपालन सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य कदम उठाएं । एक्ट की धारा 26 ए के अनुसार सभी राज्यो में फार्मेसी इंस्पेक्टर की तैनाती हो जिससे इंफोर्समेंट मजबूत हो सके ।
 उन्होंने कहा कि सुरक्षित और प्रभावी चिकित्सा सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक एलोपैथिक दवाओं का सही भंडारण, सटीक वितरण सुनिश्चित करने के लिए फार्मेसी के क्षेत्र में विधिवत योग्य व्यक्ति ही फार्मेसी के पेशे में प्रवेश करें, इस लोक कल्याण अधिनियम के तीन मुख्य उद्देश्य थे । धारा 42 के अनुसार केवल विधिवत पंजीकृत फार्मासिस्ट ही पंजीकृत चिकित्सकों के पर्चे पर दवाएं तैयार, मिश्रित या वितरित करेंगे और इसका उल्लंघन करने पर 6 महीने तक की कैद या 1000 रूपये रुपये के जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

धारा 41(2) बी के अनुसार एक पंजीकृत फार्मासिस्ट के अलावा कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ "फार्मासिस्ट", "केमिस्ट", "ड्रगिस्ट", "फार्मास्युटिस्ट", "डिस्पेंस", "डिस्पेंसिंग केमिस्ट" या ऐसे शब्दों के किसी भी संयोजन का उपयोग नहीं करेगा ।  इसका उल्लंघन करने पर पहली बार दोषी ठहराए जाने पर 500  रुपये तक का जुर्माना और बाद में दोषी ठहराए जाने पर छह महीने तक की कैद या 1000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों लगाया जा सकता है। फार्मासिस्टों के लिए शिक्षा के पहले उद्देश्य को पूरा करने के लिए, केंद्र सरकार द्वारा भारतीय फार्मेसी परिषद (पीसीआई)  का पहली बार   गठन 9 मार्च, 1949 को किया गया था। फिर पीसीआई ने पूर्व अनुमोदन के साथ शिक्षा विनियम (education regulations)1953 मे बनाए। फार्मेसी एक्ट के दूसरे उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में फार्मासिस्टों के पंजीकरण और पंजीकृत फार्मासिस्टों के आचरण की निगरानी के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए राज्य फार्मेसी परिषदों (State Pharmacy Council) का गठन किया गया था।  अपंजीकृत व्यक्तियों द्वारा दवाओं के वितरण के लिए अभियोजन शुरू करने के लिए राज्य सरकार और राज्य फार्मेसी परिषद की कार्यकारी समिति दोनों को अधिकार दिया गया है। तीसरे उद्देश्य को पूरा करने के लिए अधिनियम ने राज्य सरकार और राज्य फार्मेसी परिषद की कार्यकारी समिति को फार्मासिस्ट होने का झूठा दावा करने वालों पर मुकदमा चलाने का अधिकार दिया गया है।

फार्मास्युटिकल केयर के मामले में इंडिया अभी पीछे

के के सचान ने कहा कि फार्मेसी के क्षेत्र में विश्व स्तर की दवाओं और टीकों के निर्माण में आश्चर्यजनक सफलता के साथ भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योगों को बड़ी उपलब्धि दिया है, जिससे भारत को विश्व की फार्मेसी के रूप में मान्यता प्राप्त करने में मदद मिली है। हालांकि, फार्मेसी प्रैक्टिस के मोर्चे पर और फार्मास्युटिकल केयर के मामले में इंडिया अभी भी काफी पीछे है।  प्रत्येक नुस्खे की प्रभावकारिता में सुधार करने और दवा के सुरक्षा पहलुओं में सुधार करने के लिए या दूसरे शब्दों में आधुनिक दवाओं के तर्कसंगत उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए WHO मानक फार्मास्युटिकल केयर होना चाहिए। स्वास्थ्य सेवा के मोर्चे पर फार्मासिस्ट की भूमिका विकसित देशों के समकक्ष होनी चाहिए जैसा कि डब्ल्यूएचओ द्वारा 1994 में निर्धारित किया गया था। 

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