Chitrakoot News : गांववालों ने बयां किया दर्द, बोले- पहाड़न का पट्टा होएं से सूखैं लागी नदी, पानिवौ गा नीचे
चित्रकूट में गांववालों ने दर्द बयां किया।
चित्रकूट में गांववालों ने दर्द बयां किया। इसके साथ ही सरंक्षण का संकल्प लिया। ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़न का पट्टा होएं से सूखैं लागी नदी, पानिवौ गा नीचे।
चित्रकूट, {विकास श्रीवास्तव}। साहब, जब से सरकारैं खदानन खातिर पहाड़न का पट्टा देएं लागीं तबै से जलस्रोत बंद हुइगे और नदी सूखै लाग। यह एक इलाके के गांववालों का दर्द नहीं बल्कि एक सामूहिक आवाज है। पहाड़ों की तलहटी में बसे गांव के लोगों ने पर्यावरण बचाने के लिए पहाड़ों और नदियों को बचाने की आवश्यकता बताई है।
कहावत है कि पढ़ा लिखा से कढ़ा ज्यादा अक्लमंद होता है। गांव-देहात के लोगों के ऊपर यह कहावत सटीक साबित होती है। कम पढ़े लिखे या अनपढ़ लोगों की प्रकृति और पर्यावरण को लेकर की जाने वाली सोचने को मजबूर करती हैं। जलवायु संरक्षण फोरम चित्रकूट और सर्वोदय सेवा आश्रम ने बीते दिनों ग्राम पंचायत चंद्रगहना में सूरजकुंड के पास कालका देवी पहाड़ी के सुंदरीकरण को लेकर विमर्श किया तो तमाम ऐसी बातें निकलकर सामने आईं, जिनसे शासन-प्रशासन को सीख लेनी चाहिए।
अपनी बतकही में गांववालों ने इस बात को रेखांकित किया कि आधुनिकता की चकाचौंध और पैसे कमाने की हवस में हम अपने बच्चों को क्या दे जाएंगे, यह सोचना पड़ेगा। बीते दिनों हुई पीढ़ियों को बचाने के लिए बाल रक्षा सुनवाई नाम से हुई बैठक में ग्रामीणों ने गंदगी न करने, पहाड़ी के काम में श्रमदान करने, बच्चों के जन्मदिन पर एक पौधा रोपने की बात तय की।
महिलाओं ने बताया, चला गया है पानी नीचे
गांव के पास की कालका देवी पहाड़ी के नीचे से पयस्वनी नदी का पानी प्रवाहित होता है। गांव की शोभा, शांति, राममनी आदि ने बताया कि पहले नदी में बहुत पानी हुआ करता था। जमीन का पानी (जलस्तर) भी काफी ऊपर था। अब लगभग दस साल से फरवरी से नदी का पानी सूखने लगता है और मई आते आते एक पतली सी लकीर के रूप में बचता है।
बंद हो रहे जलस्रोत
गांववाले बताते हैं कि जब कालका देवी पहाड़ी में जंगल अधिक था और पहाड़ भी सलामत था तब नदी के किनारे किनारे सूरज कुंड के पास तमाम जलस्रोत थे, जो नदी में मिलते थे। सूरजकुंड की गहराई भी बहुत थी और नदी का प्रवाह भी तेज था। पर वह अब सपना रह गया।
जब से पट्टा हुआ, सब खत्म होने लगा
जलवायु संरक्षण फोरम के सदस्य रामस्वरूप बताते हैं कि जब से सरकार ने यहां का पट्टा देना शुरू किया तब से नदी भी सूखने लगी और जलस्तर भी नीचे चला गया। बताया कि कालका देवी पहाड़ी में खदान की वजह से पत्थर तोड़ने के लिए जो ब्लास्ट किए गए, उसने बड़ा नुकसान किया। ये पत्थर घरों तक में गिरते थे।
अभियान के बाद बंद हुई खदान
गांववाले बताते हैं कि यहां सामाजिक कार्यकर्ता अभिमन्यु भाई की अगुवाई में खदान बंद कराने के लिए 2016 से एक अभियान चलाया गया। यह रंग भी लाया और तत्कालीन जिलाधिकारी विशाखजी अय्यर के कार्यकाल के दौरान खनन का पट्टा देना बंद हो गया।
खदान की वजह से नहीं जा पा रहे स्कूल
गांव के छेदीलाल, कमलेश, दयाराम, साधना आदि ने बताया कि पहाड़ी में खदान की लंबाई होने से बच्चों को स्कूल जाने में खतरा है। यह इतनी चौड़ी है कि आएदिन यहां पशु गिर जाते हैं। स्कूल जाने का रास्ता भी खदान के बगल से है, इससे अभिभावक बच्चों को भेजने से कतराते हैं।
मंदिर का सुंदरीकरण करने का संकल्प
सामाजिक कार्यकर्ता विशेष कुमार त्रिपाठी ने बताया कि बैठक में गांववालों ने तय किया कि पर्यावरण की रक्षा तो करेंगे ही कालका देवी मंदिर का सुंदरीकरण भी करेंगे। गांववालों का मानना था कि मां कालका देवी खुश होंगी तो गांव में खुशहाली आएगी। इस दौरान कालका देवी पहाड़ी का सीमांकन कर तारों से घेरने, तालाब में मोटर लगाकर पाइपलाइन बिछाने, पौधरोपण कराने और श्रद्धालुओं के लिए आश्रय स्थल बनाने का संकल्प लिया।
