बरेली: ईको फ्रेंडली गणेश की मूर्तियों की मांग बढ़ी

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

बरेली,अमृत विचार। बदलते समय के साथ ईको फ्रेंडली हमारी जिंदगी की अहम जरूरत बन चली है। इस पर एक बार फिर प्रकृति ने अपनी मोहर लगा दी है। ईको फ्रेंडली मूर्तियों को घर में आसानी से विसर्जित किया जा सकता है। इस वजह से कोरोना काल में इस बार हर कोई गणपति की ईको फ्रेंडली …

बरेली,अमृत विचार। बदलते समय के साथ ईको फ्रेंडली हमारी जिंदगी की अहम जरूरत बन चली है। इस पर एक बार फिर प्रकृति ने अपनी मोहर लगा दी है। ईको फ्रेंडली मूर्तियों को घर में आसानी से विसर्जित किया जा सकता है। इस वजह से कोरोना काल में इस बार हर कोई गणपति की ईको फ्रेंडली प्रतिमा की मांग कर रहा है। इन मूर्तियों का मूल्य 200 रुपए से लेकर 5100 व उससे अधिक मूल्य की भी मिल जाएगी।

बाजार में मूर्ति व्यवसायियों ने बताया कि कोलकाता और महाराष्ट्र से आई ईको फ्रेंडली मूर्तियों की खूब बिक्री हुई है। कोरोना के चलते इन मूर्तियों को इसलिए भी पंसद किया जा रहा है, क्योंकि इन मूर्तियों को विर्सजन घर में ही किया जा सकता है। फैलते कोरोना संक्रमण के चलते शासन की ओर से विर्सजन यात्रा पर भी पूरी तरह रोक है।

पिछले तीन सालों में पीओपी की प्रतिमाओं के बजाए मिट्टी सहित प्राकृतिक वस्तुओं से बनी प्रतिमाएं लोग अधिक पसंद कर रहे हैं। जबकि इस साल कोरोना का साया है, ऐसे में शहरवासी रामगंगा में विसर्जित करने के बजाय घर में बाल्टी, टब आदि में विर्सजित करने के लिए इन मूर्तियों को खरीद रहे है। दुकानदारों की मानें तो इन मूर्तियों को घर में विर्सजन के बाद मिट्टी व पानी में एक पौधा लगाया जाता है।

बता दें कि भाद्रपद मास के शुक्‍ल पक्ष की चतुर्थी के साथ आरंभ होने वाली विनायक पूजा 10 दिन तक चलती है। हालांकि कुछ लोग 3 से चार दिन ही पूजा अर्चना करने के बाद गणपति की विदाई कर देते है। इसमें प्रतिदिन सुबह-शाम भगवान की पूजा-अर्चना होगी और मोदक का भोग लगाया जाता है। साथ ही सुख, समृद्धि, आरोग्‍य की कामना की जाती है।

शांत स्वभाव की मनमोहक छवि पसंद 
बाजार में गणेश की मूर्तियों में लोगों की पहली पसंद शांत स्वभाव पद्मासन मुद्रा की मूर्तियां हैं। मूर्तियों में कदंब पर विराजमान लक्ष्मी-गणेश, सिंहासन पर बैठे गणेशजी, सेठ रूप में गणपति, उल्लू वाहन पर लक्ष्मीजी, गजलक्ष्मी है। पांच  इंच से लेकर 16 इंच की मूर्तियां बाजार में हैं। कद और कलाकारी के अनुसार मूर्ति की कीमत तय होती है।

पीओपी से बनीं मूर्तियों से नुकसान
पीओपी और प्लास्टिक से बनी प्रतिमाओं में खतरनाक रसायनिक रंगों का इस्‍तेमाल किया जाता है। यह रंग स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी काफी हानिकारक होते हैं। इन प्रतिमाओं के रसायनिक रंग पानी में मिल जाते हैं और बाद में इसी पानी का इस्तेमाल खाना पकाने और नहाने जैसे कामों में किया जाता है। ऐसे पानी के इस्तेमाल से लोग बीमार भी हो जाते हैं।

संबंधित समाचार