प्रयागराज : जघन्य अपराधों के खिलाफ राजनीतिक दल व पुलिस बल की संगठित कार्यवाही आवश्यक

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि समाज तीन प्रमुख समस्याओं जैसे अपराध, भ्रष्टाचार और जनसंख्या का सामना कर रहा है। अपराध और भ्रष्टाचार को सख्त राज्य कार्यवाही और हस्तक्षेप से नियंत्रित किया जा सकता है तथा जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के लिए प्रेरणा, शिक्षा के प्रसार और जागरूकता सहित कानूनी कदम तथा रणनीति की आवश्यकता है। राज्य को अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति पर कायम रहना चाहिए।

गैंगस्टर विकास दूबे से जुड़े एक मामले पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राजनीतिक दलों व पुलिस प्रशासन की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को 'अपना आदमी' और 'हमारा आदमी' के विचार से प्रभावित हुए बिना अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह दृष्टिकोण ना केवल कानून के शासन को कमजोर करेगा, बल्कि राष्ट्र के लोकतांत्रिक ढांचे को भी नुकसान पहुंचाएगा। इसी तरह पुलिस को कानून और व्यवस्था सुनिश्चित करने, अपराध को रोकने तथा अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही करने जैसा जटिल कार्य करना होता है। इन सभी के लिए होमवर्क और टीम वर्क की आवश्यकता होती है और अगर पुलिस बल का कोई भी सदस्य पुलिस रणनीति को लीक करना शुरू कर दे तो रणनीति विफल होने की पूरी संभावना रहती है और निश्चित रूप से कभी-कभी इसका परिणाम विनाशकारी सिद्ध होता है। 

ऐसी स्थिति में पुलिसकर्मियों के बीच 'काले भेड़ों' की पहचान, उनके आचरण की निगरानी तथा उन्हें अलग करने के साथ ही उनके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्यवाही करना आवश्यक है। मौजूदा मामले में याची के खिलाफ आरोप है कि उसके गैंगस्टर विकास दूबे के साथ घनिष्ठ संबंध थे। उसने सचिवालय,उत्तर प्रदेश के जाली प्रवेश पास का इस्तेमाल अपने वाहन पर चिपका कर किया था। इस वाहन का उपयोग याची द्वारा मारे गए गैंगस्टर विकास दूबे को सुरक्षित मार्ग प्रदान करने के लिए किया गया था, जो बिकरू नरसंहार का मुख्य आरोपी था। याची की ओर से यह तर्क दिया गया है कि याची को व्यवसायी होने के कारण कुछ स्थानीय उच्च स्तरीय राजनेताओं के साथ राजनीतिक प्रतिद्वंदिता होने के कारण झूठे और तुच्छ दस्तावेजों तथा गवाहों के आधार पर उक्त अपराध में शामिल किया गया है, साथ ही रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे यह सिद्ध होता है कि वाहन के विंडशील्ड पर कथित लखनऊ, सचिवालय का फर्जी प्रवेश पास चिपका हुआ है।

आरोपी पिछले 2 साल से अधिक समय से जेल में निरुद्ध है। इतनी लंबी अवधि उसकी स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करती है। इस पर कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त पर पड़ने वाले शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव से कोर्ट बेखबर नहीं है, लेकिन ऐसे अपराध के खिलाफ सामाजिक प्रतिक्रिया भी तीखी होती है। अतः अपराध की गंभीर और जघन्य प्रकृति, साजिश में अभियुक्त की मिलीभगत और मामले की समग्र परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने आरोपी जय बाजपेयी उर्फ जयकांत वाजपेयी की जमानत याचिका खारिज कर दी। उक्त आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने उप निरीक्षक रवि शंकर पांडेय द्वारा आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत कानपुर नगर में दर्ज मामले की सुनवाई करते हुए दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने निचली अदालत को उपरोक्त मामले का ट्रायल एक साल के अंदर पूरा करने का निर्देश दिया है।

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