प्रयागराज: जबरन धर्म परिवर्तन करवाने और दुष्कर्म के आरोपी की जमानत याचिका खारिज
प्रयागराज, अमृत विचार। लव जिहाद से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी विशेष टिप्पणी में कहा कि यह हनी ट्रैप का मामला प्रतीत नहीं होता है, बल्कि यह याची द्वारा खुद को अलग धर्म का व्यक्ति बताकर पीड़िता को जाल में फंसाने का मामला है। उसकी अवांछित तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डालने की धमकी देकर उसकी मर्जी के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने का स्पष्ट मामला बनता है, इसलिए जमानत की अर्जी खारिज की जाती है। उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने चांद बाबू उर्फ विशाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
दरअसल याची के खिलाफ बरेली के थाना कोतवाली में आईपीसी की विभिन्न धाराओं तथा उत्तर प्रदेश अवैध धर्म परिवर्तन रोकथाम अधिनियम की धारा 3/5 के तहत शिकायत दर्ज करवाई गई थी। अपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट), बरेली द्वारा 16 दिसंबर 2022 को पारित आदेश द्वारा जमानत अर्जी खारिज होने के बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। प्राथमिकी के तथ्यों के अनुसार करीब पांच महीने पहले पीड़िता को एक लड़के (आरोपी) का फोन आया, जिसने अपना परिचय विशाल के रूप में दिया और वे आपस में बात करने लगे। पीड़िता उससे मिलने बरेली आती थी, जहां उसकी अवांछित तस्वीरों को वायरल करने की धमकी देकर उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया जाता था। पीड़िता ने आगे बताया कि 24.08.2022 को जब आवेदक पीड़िता को एक होटल में ले गया, तो उसे पता चला कि लड़के का असली नाम चांद बाबू है और वह मुस्लिम धर्म से है। सच्चाई पता चलने के बाद पीड़िता को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाने लगा।
आरोपी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह हनीट्रैप का विशिष्ट मामला है, जिसमें याची को पीड़िता द्वारा फंसाया जा रहा है। यह असंभव है कि बार-बार दुष्कर्म होने के बाद भी पीड़िता ने कभी प्राथमिकी दर्ज कराने का प्रयास नहीं किया और याची से बार-बार मिलने के बाद भी उसे उसके धर्म के बारे में पता नहीं चला। इसके साथ ही अधिवक्ता ने होटल के आगंतुक रजिस्टर की एक प्रति का हवाला देते हुए कहा कि याची का नाम चांद बाबू है और पीड़िता का नाम नेहा खान लिखा है।
दूसरी ओर सरकारी अधिवक्ता ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता ने प्राथमिकी के साथ-साथ सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज अपने बयानों में विशेष रूप से कहा है कि आवेदक ने खुद को एक हिंदू लड़का बताया था। उसने शादी का वादा करके पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाया। इसके अलावा होटल के रजिस्टर में पीड़िता का हस्ताक्षर सीमा नाम से है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वह नहीं जानती थी कि आगंतुक रजिस्टर में उसका नाम नेहा खान के रूप में दिखाया गया है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्को तथा मामले की परिस्थितियों को समझते हुए पीड़िता के बयान पर भरोसा जताया और आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए विचारण न्यायालय को निर्देश दिया कि यदि पीड़िता का बयान दर्ज नहीं किया गया है, तो चार महीने की अवधि के भीतर उसका बयान दर्ज किया जाए। तत्पश्चात आरोपी ट्रायल कोर्ट के समक्ष जमानत के लिए नए सिरे से आवेदन दायर करने के लिए स्वतंत्र है।
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