बरेली: खामोश रहे लब...वोटराें के मिजाज को भांप नहीं पा रहे प्रत्याशी
जागरूक मतदाताओं ने अंतिम क्षण तक नहीं खोली जुबान, दिनभर चला कयासबाजी का दौर, किसी को नहीं पता वोटरों के मन की बात
बरेली, अमृत विचार : बदलते वक्त के साथ जिस तरह से चुनाव दर चुनाव राजनीति बदल रही है, ठीक उसी तरह से जागरूक मतदाताओं का मिजाज भी बदल रहा है। अब पहले जैसा न दौर है न मतदाता। वोटर हर किसी के साथ होने का दावा कर किसी को भी नाराज नहीं करना चाहता, लेकिन मन की बात बताकर भेद भी नहीं खोलना चाहता।
नगर निकाय के इस बार के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही मिजाज वोटरों का देखने को मिला। बड़ी खामोशी के साथ बूथों पर पहुंचे वोटरों ने साइलेंट वोटिंग की है, इससे दावेदारों की धड़कनें बढ़ गई हैं। दरअसल, पहले की राजनीति में वोटर खुलकर प्रत्याशी का समर्थन करते थे, लेकिन मतदाता का मिजाज अब बदल चुका है।
चुनाव से पहले दरवाजे पर आने वाले हर प्रत्याशी को वोटर आशीर्वाद स्वरूप वोट देने का आश्वासन देकर खुश कर देते हैं, लेकिन करते अपनी मर्जी का है। लोकतंत्र में ऐसा उनका अधिकार भी है। गुरुवार को नगर निकाय के चुनाव में मतदाताओं ने अंतिम क्षण तक वोट का राज नहीं खोला।
गुरुवार दोपहर 12 बजे मौलाना आजाद इंटर कॉलेज मतदान केंद्र के बाहर खड़े होकर कुछ दावेदार अपने समर्थकों से फोन पर बात कह रहे थे कि जरा पूछना कि अपने घर के पीछे रहने वाले नासिर (बदला हुआ नाम) का व उनके परिवार का वोट किधर गया।
यह हाल किसी का एक केंद्र या बूथ का नहीं था शहर के अधिकतर बूथों पर इसी तरह से प्रत्याशी वोटरों के मिजाज को भांपने के लिए लोगों को लगा रखा था, लेकिन इसके बाद भी मतदाताओं के मिजाज को वह भांप पाने में नाकाम ही रहे।
इधर-उधर देखा...मुस्कुराए और फिर चल दिए: पोलिंग बूथों पर वोट डालने के लिए कतार में खड़े मतदाताओं का मूड भांपने के लिए प्रत्याशी और उनके समर्थक जुटे रहे। सदर तहसील के बाहर एक महिला आई। वोट डालकर जा रहे दंपती से पूछा कि किसको दिया है। दंपती ने इधर उधर देखा, फिर मुस्कुराते हुए सिर हिलाकर आगे चल दिए।
मसलन, खुलकर कोई जवाब नहीं दिया। इसको लेकर पूरे दिन कयासबाजी का दौर चलता रहा। सुबह से लेकर शाम तक वोटर मतदान करते रहे, लेकिन किधर जा रहे हैं, इसकी किसी को सटीक जानकारी नहीं हो सकी।
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