संभल के सींग समेत तीन शहरों के उद्योगों को मिला जीआई टैग, बढ़ेगी तरक्की
भारत सरकार के बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत संभल, मैनपुरी और महोबा के उद्योगों को मिला जीआई टैग, जीआई टैग को लेकर साक्ष्यों के आधार पर चेन्नई और दिल्ली में चली सुनवाई
संभल, अमृत विचार। भारत सरकार के बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत संभल के सींग, मैनपुरी की तारकशी और महोबा के गौरा पत्थर उद्योग को जीआई टैग (जीओ ग्राफिकल इंडिकेटर) मिला है। इस उपलब्धि से उद्योगों की देश तथा दुनिया में तरक्की और बढ़ेगी। इससे उत्तर प्रदेश का नाम भी रोशन होगा। खास बात यह है कि जीआई टैग मिलने के बाद अब उद्योगों को देश में कहीं भी शुरू करने के लिए संबंधित संगठनों की अनुमति लेनी होगी। संभल के सींग उद्योग को जीआई टैग मिलने पर निर्यातकों और कारोबारियों में खुशी का माहौल है।

नाबार्ड उत्तर प्रदेश लखनऊ के वित्तीय सहयोग से हयूमन वेलफेयर एसोसिएशन ने तकनीकी दस्तावेज तैयार कर स्थानीय उत्पादक संस्थाओं और एमएसएमई के साथ मिलकर जीआई रजिस्ट्री चेन्नई को वर्ष 2019 में भेजा था। इसमें तारकशी हस्तशिल्प सहकारी समिति ने मैनपुरी के तारकशी, गौरा उद्योग औद्योगिक सहकारी समिति ने महोबा के गौरा पत्थर हस्तशिल्प, हैंडीक्राफ्ट वेलफेयर एसोसिएशन ने संभल के सींग क्राफ्ट को जीआई टैग देने के लिए आवेदन किया था।
लंबी कानूनी और तकनीकी प्रक्रिया के बाद भारत सरकार के बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत सुनवाई हुई। अब 2023 में इन तीनों शहरों के उद्योगों को जीआई टैग मिल गया है। इससे उत्तर प्रदेश सबसे अधिक जीआई टैग पंजीकरण वाला राज्य हो गया है। पदमश्री से सम्मानित जीआई विशेषज्ञ डॉ. रजनीकांत के अनुसार जीआई टैग की सूचना अधिकृत वेबसाइट पर भी अंकित की जा चुकी है।
तीन साल की मशक्कत,अब रफ्तार पकड़ेगा कारोबार
संभल हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष कमल कौशल वार्ष्णेय ने बताया कि तीन साल से अधिक समय से जीआई टैग को लेकर सुनवाई चली। लंबी लड़ाई के बाद सींग उद्योग को जीआई टैग मिला है। यह संभल के लिए बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि अब अगर सींग उद्योग को देश के किसी दूसरे शहर में शुरू करना होगा तो उसके लिए हैंडीक्राफ्ट वेलफेयर एसोसिएशन की अनुमति लेनी होगी। इससे संस्था का गौरान्वित होना लाजिमी है। जीआई टैग मिलने से उद्योग और निर्यात में नई जान आएगी। पूरी दुनिया में भारत की साख भी बढ़ेगी।
चेन्नई और दिल्ली में चली जीआई टैग की सुनवाई
हैंडीक्राफ्ट वेलफेयर एसोसिएशन के उपाध्यक्ष कमल कौशल वार्ष्णेय ने बताया कि भारत सरकार के बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत जीआई टैग के लिए चेन्नई कार्यालय में पत्रावली पर सुनवाई चली। चूंकि वहां तक जाने में परेशानी होती थी इसलिए पत्रावली को दिल्ली के कार्यालय में मंगवाया गया। यहां भी काफी समय तक साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई चलती रही। अब जाकर सींग उद्योग को जीआई टैग मिला है।
सालाना चार सौ करोड़ का कारोबार
सरायतरीन में चल रहा सींग उत्पादों का उद्योग देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में पहचान बनाए हुए है। यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका में भी सींग के उत्पादों का निर्यात होता है। आंकड़ों के अनुसार एक साल में करीब 400 करोड़ रुपये का कारोबार किया जाता है। इस कारोबार से निर्यातकों, कारोबारियों और कारीगरों को मिलाकर करीब 10 हजार लोग जुड़े हुए हैं।
यह है जीआई टैग
किसी भी क्षेत्र का जो क्षेत्रीय उत्पाद होता है उससे उस क्षेत्र की पहचान होती है। उस उत्पाद की ख्याति जब देश और दुनिया में फैलती है तो उसे प्रमाणित करने के लिए एक प्रक्रिया होती है, जिसे जीआई टैग यानी जीओ ग्राफिकल इंडिकेटर कहते हैं। इसे हिंदी में भौगोलिक संकेतक नाम से जाना जाता है।
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