Banda: बैलगाड़ी से आई बारात, देखते रह गए लोग, दुल्हन भी उसी से हुई विदा, क्षेत्र में बनी चर्चा का विषय, पढें- पूरी खबर
बांदा में बैलगाड़ी से आई बारात।
बांदा में बैलगाड़ी से बारात आई। दुल्हन भी उसी से विदा हुई। एक पखवाड़ा पहले भी क्षेत्र में एक बारात ऐसे ही आई थी।
बांदा, अमृत विचार। बुंदेलखंड में अक्सर बुजुर्गों द्वारा कही जाने वाली यह बात कि गुजरा जमाना एक बार फिर से वापस लौटता है, सच होता दिख रहा है। तकरीबन आधा शताब्दी पहले जब सड़कों पर चार पहिया वाहन फर्राटे नहीं भरते थे तब यहां के ग्रामीण अंचलों में बारात सजी-धजी बैलगाड़ियों से जाती थी।
महंगी शादियों से तौबा करते हुए वायु और ध्वनि प्रदूषण से छुटकारा पाने को बुंदेलखंड में यह परंपरा फिर शुरू हो गई। इस वर्ष की जनपद में यह दूसरी बारात है, जो पुरानी परंपराओं को आत्मसात करते हुए वर पक्ष के लोग बैलगाड़ियों पर सवार होकर कन्या पक्ष के दरवाजे पर पहुंचे। कस्बे में तमाशाइयों का मजमा लगा रहा।
सोलह संस्कारों में विवाह एक ऐसा बंधन है, जिसे हर कोई अपनी जिंदगी में यादगार बनाना चाहता है। इसलिये समाज में तमाम लोग कर्ज लेकर शादी में अनापशनाप रुपया पानी की तरह बहाते हैं। कार, बग्घी और घोड़ी के बाद तमाम लोगों ने कन्या पक्ष के यहां बारात ले जाने को हवाई जहाज तक का प्रयोग किया। दूल्हे के हेलीकॉप्टर से दूल्हन को विदा कराने के भी तमाम मामले आये। दुल्हन व कन्या पक्ष के लोगों को प्रभावित करने का अब जब कोई और नया जरिया नहीं बचा तो बुंदेली बारातियों को एक बार फिर वही बैलगाड़ी भाने लगी है, जिस पर सन् 50 और 60 के दशक में सवार होकर बारात कन्या पक्ष के दरवाजे पर पहुंचती थी।
इसके लिये गांव भर के लोगों को दावत देकर उनकी बैलगाड़ियां मंगवाकर न सर्फ बैलगाड़ी बल्कि उसमें जोते जाने वाले बैलों की जोड़ियों की भी बेहतर साज-सज्जा की जाती थी। दूर जाने वाली बारात एक या दो दिन पहले ही गंतव्य के लिये रवाना हो जाती थी और रास्ते में पड़ने वाले जंगल में ही खाना पकाया जाता था। बारात भी कम से कम से कम तीन से पांच दिन कन्या पक्ष के यहां ठहरती थी।
कई बार तो कन्या पक्ष के लोग बारात को दुल्हन के साथ तब तक विदा नहीं करते थे, जब तक कि बारातियों की आवाभगत से वे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाते थे। मानस में भी श्रीराम विवाह के संबंध में ऐसा ही वर्णन मिलता है। भगवान राम की बारात दो माह से भी अधिक मिथिला में ठहरी थी।
रविवार शाम कस्बे के मैरिज हॉल में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। यहां ग्राम दफ्तरा से पुरानी परम्परा को कायम रखते हुए भारतीय किसान यूनियन के जिला महासचिव अवधेश सिह पटेलके पुत्र अनूप कुमार की बारात बैलगाड़ी से तकरीबन 14 किलो मीटर चलकर पहुंची। बैलगाड़ी से पहुंची बारात का भी कन्या पक्ष ने मैरिज हॉल में पुरानी परंपराओं से ही स्वागत-सत्कार किया।
बारात में बैलगाड़ियों के आगे नाचते घोड़े भी शादी में आकर्षण का केंद्र बने रहे। दूसरे दिन आज दुल्हन मधुमिता पुत्री सनदकुमार निवासी ग्राम नरेन्द्रपुर कदरत नक्सर पारा दक्षिण24 पारागंज कोलकाता भी आधुनिकता से दूर बैलगाड़ी से ही विदा हुई। दूल्हा व दुल्हन मैनेजमेंट का कोर्स पूरा करके नौकरी की तलाश में हैं। तकरीबन एक पखवाड़ा पहले एक भाजपा नेता ने बबेरू कस्बे में बैलगाड़ी से अपने बेटे की बारात लाकर यह परंपरा दोबारा शुरू की थी। इस बारात अब तक पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है।
