प्रयागराज : विक्रय संबंधित दस्तावेजों में क्या अंकित है, यह जानने की आवश्यकता एक गवाह को नहीं
अमृत विचार, प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संपत्ति के विक्रय और खरीदारी के संदर्भ में गवाह की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि भूमि विक्रय संबंधी समझौते का गवाह केवल विक्रेता और खरीदार द्वारा दस्तावेज़ के उचित निष्पादन की गवाही देता है। दस्तावेज में क्या अंकित है, यह जानने की आवश्यकता एक गवाह को नहीं है।
वर्तमान मामले में याची का दावा है कि उसका नाम विवादित समझौते में साक्ष्यांकित गवाह के रूप में उल्लिखित है, लेकिन याची ने समझौते पर कोई हस्ताक्षर नहीं किया है। उक्त विवादित संपत्ति पर उनका कब्जा भी नहीं है। अतः याची को कथित अपराध के लिए केवल तभी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जब यह पाया जाए कि विवादित संपत्ति में उसका कोई हित छुपा है और उसने केवल अपने हितों की रक्षा के लिए बेचने के समझौते को प्रमाणित किया है, लेकिन मौजूदा मामले में ऐसा नहीं है।
उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ की एकलपीठ ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत जूही थाना, जिला कानपुर नगर में दर्ज प्राथमिकी के सापेक्ष निचली अदालत द्वारा जारी समन आदेश व पूरक शपथ पत्र को निरस्त करने की मांग करने वाली अजीत कुमार गुप्ता की याचिका स्वीकार करते हुए संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया।
दरअसल विपक्षी द्वारा 2 जून 2014 को दर्ज प्राथमिकी में आरोप लगाया गया कि विपक्षी पिछले 11 वर्षों से अमेरिका में रह रही है। याची अजीत कुमार गुप्ता व सह आरोपीयों ने अपराधियों की मदद से उसके मकान पर कब्जा कर लिया। आगे यह भी आरोप लगाया गया कि आरोपी व्यक्तियों ने अपने अवैध कब्जे को न्यायोचित ठहराने के लिए फर्जी दस्तावेज भी तैयार करवाए, जिस पर उनकी मां ने कभी हस्ताक्षर नहीं किए। फिर भी उनके हस्ताक्षर डिजिटल रूप से बनाए गए।
याची के अधिवक्ता ने निवेदन किया कि जांच के पश्चात पुलिस द्वारा केवल सह अभियुक्त के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया था लेकिन बाद में सह आरोपी के कहने पर पुलिस द्वारा आगे की जांच कर याची के खिलाफ पूरक आरोप पत्र दाखिल किया गया। इसी आधार पर निचली अदालत ने याची को तलब किया। इसके साथ ही याची का कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है।
याची के अधिवक्ता ने आगे यह भी तर्क दिया कि मामले की जांच मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना हुई है तथा पूरक आरोप पत्र भी अवैध रूप से दाखिल किया गया है। इस पर विरोधी पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि पुलिस द्वारा जांच के लिए किसी प्रकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। पुलिस के पास जांच की असीमित शक्ति है। सभी तथ्यों और परिस्थितियों का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने अंत में याचिका स्वीकार करते हुए याची के खिलाफ पारित आदेशों को रद्द कर दिया।
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