Sawan 2023 : भक्तों की मुराद पूरी करते दूधेश्वर महादेव, मंदिर में स्थापित है मुखाकृति वाली शिवलिंग, पढ़ें- पूरी खबर

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Sawan 2023 कानपुर के शिवराजवपुर में दूधेश्वर मंदिर स्थित है।

Sawan 2023 कानपुर के शिवराजवपुर में दूधेश्वर मंदिर स्थित है। यहां भक्तों की पूरी मुराद दूधेश्वर महादेव पूरी करते है।

कानपुर, [अश्वेन्द्र कटियार शिंपू]। Sawan 2023 शिवराजपुर कस्बे से दो किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में छतरपुर गांव का अश्वत्थामा मंदिर और दूधेश्वर मंदिर लोगों की अगाध आस्था का केंद्र है। दूधेश्वर के शिवलिंग में मुखाकृति बनी हुई है, जो द्वापर कालीन होने का प्रमाण देती है। पुराणों में उल्लेख है कि द्वापर में गुरु द्रोणाचार्य का यह आश्रम हुआ करता था।

यहीं पर कौरव और पांडवों ने शस्त्र शिक्षा ग्रहण की थी। इस स्थान को पुराने समय में सिद्धेश्वर आश्रम और शिवलिंग को क्षीरेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता था। आज भी मान्यता है कि जो भक्त शंकर जी के पास आकर श्रद्धा और विश्वास के साथ अपनी मनोकामना कहता है तो दूधेश्वर महादेव अवश्य पूर्ण करते हैं।

वैसे तो इस मंदिर में रोज ही भक्तों का तांता लगता है, लेकिन सावन माह में इस मंदिर का अलग ही महत्व है। पुराने पत्थरों को देखकर पुरातत्व वैज्ञानिकों ने बताया कि यह मंदिर पहले लाल पत्थर का बना था, जो लगभग 3000 से 4000 वर्ष पूर्व का है। इतिहासकारों का मानना है कि औरंगजेब के शासनकाल में पत्थर से बने इस विशाल मंदिर को तोड़ दिया गया था।

तोड़े जाने के बाद इस विशाल मंदिर ने पहाड़ी का रूप ले लिया था। सैकड़ों वर्षों तक यह खंडहर के रूप में पड़ा रहा। सिर्फ एक पीपल का पेड़ था। उसके नीचे शिवलिंग की सफेद लाट दिखाई पड़ती थी। चारों तरफ जंगल होने के कारण यदा-कदा ही भक्त वहां जाते थे और उनकी पूजा-अर्चना करते थे। 

वर्ष 1950 के आसपास यहां संत बैरागी बाबा मस्तराम का आगमन हुआ। इसके पहले संत बाबा मस्तराम खेरेश्वर गंगा घाट पर स्थित मंशा देवी मंदिर में रह रहे थे। वहां पर उन्हें स्वप्न आया कि दूधेश्वर स्थान में आपकी जरूरत है। स्वप्न के अनुसार बाबा मस्तराम जंगल में आकर झोपड़ी बनाकर रहने लगे। बाबा के पास जो भक्त आता था, उसके मन की बात उसके कहने के पहले ही बाबा बता देते थे। सिद्धी होने के कारण बाबा की प्रसिद्धि चारों तरफ फैल गई। उन्होंने शिवलिंग के चारों तरफ की मिट्टी हटाई तो 14 फुट ऊंची शिवलिंग की लाट मिली। 

लाट मिलने के बाद बाबा ने यह ठान लिया कि शिवलिंग को मंदिर में स्थापित कराया जाए। उन्होंने उसी समय क्षेत्रवासियों के सहयोग से नए मंदिर का निर्माण कराया था। धीरे-धीरे इस मंदिर की प्रसिद्धि चारों तरफ फैल गई और सैकड़ों की संख्या में भक्त आने लगे। द्रोणाचार्य का आश्रम होने के कारण 100 मीटर की दूरी पर उनके पुत्र अश्वत्थामा का भी मंदिर बना है, जिसमें छोटे शिवलिंग विराजमान हैं। अश्वत्थामा की पुरानी पत्थर की मूर्ति दीवार पर लगी है, जो भगवान शिव की तपस्या करते हुए आज भी दिखाई दे रहे हैं। 

ग्रंथों के अनुसार पांडव पुत्रों के सिर काट लेने के बाद द्रोपदी ने भीम को अश्वत्थामा का वध करने की बात कही थी। वहां पर मौजूद भगवान कृष्ण ने भीम से कहा कि ब्राह्मण पुत्र को मारना उचित नहीं है। इसके माथे की मणि निकाल लो। मणि निकलने के कारण रक्तस्राव होता रहेगा और इसको हमेशा पीड़ा बनी रहेगी।

समस्या के निराकरण के लिए उन्हें भगवान कृष्ण ने यह बताया था कि तुम्हारे माथे से रक्त स्राव होता रहेगा। उसके लिए तुम्हें भगवान शंकर की तपस्या करनी चाहिए। कलयुग के 5000 वर्ष बीत जाने पर तुम्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिल जाएगी। कहा जाता है कि उसी के बाद आज भी अश्वत्थामा मंदिर में भगवान शिव की पूजा कर रहे हैं। दूधेश्वर आश्रम में शंकर जी का मंदिर बनने के बाद भगवान विष्णु, हनुमान जी, संतोषी माता, दुर्गा माता की मूर्तियां स्थापित हुईं।

स्वप्न आने के बाद एक और मंदिर का निर्माण

काकूपुर रब्बन के रहने वाले डॉ. एसएन बाजपेई ने मंदिर बनवा कर बांके बिहारी की स्थापना कराई थी। दूधेश्वर आश्रम का क्षेत्रफल छह बीघे है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने समय में मंदिर कितना विशाल रहा होगा। डॉ. एसएन वाजपेई ने बताया कि अक्सर स्पप्न आते थे, जिसके बाद उन्होंने इस मंदिर का निर्माण कराया।

पुराणों में अश्वत्थामा मंदिर का व्याख्यान 

विद्वानों ने बताया कि पुराणों में दर्ज है कि द्रोणाचार्य इसी जगह पर पांडवों को धनुष बाजी सहित अन्य विधाओं का ज्ञान दिया था। विद्वानों ने बताया कि ऐसा कहा जाता है कि अश्वत्थामा का छतरपुर गांव स्थित यह पुराना मंदिर है। अश्वत्थामा पास के खेरेश्वर और दूधेश्वर मंदिर में सबसे पहले पूजा करते हैं।

भादौं के आखिरी शनिवार को अद्भुत श्रृंगार

भादौं मास के आखिरी शनिवार को सभी मंदिरों के साथ-साथ दूधेश्वर मंदिर में श्रृंगार होता है। उस दिन यहां भगवान शिव की पूजा-अर्चना के साथ मंदिर परिसर में सजावट की जाती है। भक्तों के लिए प्रसाद की व्यवस्था की जाती है। रात में रामलीला का भी आयोजन किया जाता है। दो वर्ष पूर्व पास बने बांके बिहारी मंदिर में भी श्रंगार होने लगा है।

सावन भर मंदिर में होता रुद्राभिषेक

कहा जाता है कि दूधेश्वर मंदिर में जो भी भक्त अपनी पीड़ा लेकर आता है, भगवान उसको जरूर दूर करते हैं। इससे यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। सावन के पूरे महीने दूरदराज से भक्त यहां रुक कर भगवान शिव की पूजा-अर्चना के साथ श्रंगार कर प्रसाद वितरण करते हैं।

संतान की मुराद पूरी करते महादेव

मंदिर के पुजारी तुलसीराम बताते हैं कि जिनके संतान न हो रही हो तो पति-पत्नी दोनों लोग यहां पर आकर भोले बाबा से अपनी व्यथा कहते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करते हैं तो यह आश्रम उन्हें निराश नहीं करता है। ऐसी शक्ति आज भी विराजमान है।

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