मनोज सिन्हा ने कहा- कुछ लोगों को लगता है कि सरकारी जमीन पर घर बनाने का अधिकार सिर्फ उनका है

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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल (एलजी) मनोज सिन्हा ने शुक्रवार को कहा कि बेघर परिवारों को जमीन देने के संघ शासित प्रदेश के प्रशासन के फैसले से कुछ लोग नाराज हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार की संपत्तियों पर सिर्फ उन्हीं का अधिकार है। संघ शासित प्रदेश में बेघर लोगों को 150 वर्ग गज जमीन देने की हालिया योजना की आलोचना की पृष्ठभूमि में सिन्हा ने यह टिप्पणी की है। शेर-ए-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केन्द्र (एसकेआईसीसी) में आयोजित राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव को संबोधित करते हुए सिन्हा ने कहा, कुछ दिन पहले जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने फैसला लिया कि जिनके पास जमीन नहीं है वे भी प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए पात्र होंगे और उन्हें जमीन दी जाएगी। 

अन्य राज्यों में भी ऐसी नीति है कि उन्हें जमीन दी जा सकती है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में ऐसी कोई नीति नहीं थी। हमने उन्हें पांच ‘मार्ला’ या 150 वर्ग गज जमीन देने का फैसला लिया। उन्होंने बताया कि यह जमीन प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत दी जा रही है और अभी तक 2,711 गरीबों को जमीन दी गई है ताकि वे अपना मकान बना सकें। उपराज्यपाल ने कहा, लेकिन इससे कुछ लोगों को परेशानी हो रही है। जिन लोगों ने अपने और रिश्तेदारों के मकान सरकारी संपत्ति पर बनाए हैं, उन्हें लगता है कि सरकारी संपत्तियों पर सिर्फ उन्हीं का अधिकार है। और गरीबों को सरकारी संपत्ति को उपयोग करने से रोक देना चाहिए। 

सिन्हा ने कहा, उन्हें पता होना चाहिए कि ऐसी व्यवस्था खत्म हो गई है। भेदभाव करने वाले तंत्र का पांच अगस्त, 2019 को अंत हो गया और प्रशासन तथा प्रधानमंत्री की सोच है कि सरकारी संसाधनों पर पहला अधिकार देश और जम्मू-कश्मीर के गरीबों, दलितों और आदिवासियों का होना चाहिए। कश्मीर घाटी में राजनीतिक दलों ने इस नीति को लेकर चिंता जतायी है और प्रशासन से भूमिहीन लोगों के वर्गीकरण पर स्पष्टीकरण देने की मांग की है।

 हुर्रियत कांफ्रेंस ने शुक्रवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल द्वारा घोषित ‘भूमिहीनों के लिए भूमि’ से लोगों के बीच गंभीर चिंताएं और शंका पैदा हो गई हैं और उसने प्रशासन से इसपर स्पष्टीकरण देने को कहा। पार्टी ने एक बयान में कहा, जम्मू-कश्मीर में 1.99 लाख भूमिहीनों को जमीन देने की प्रशासन की घोषणा से लोगों में शंका और चिंता पैदा हुई है। इन ‘भूमिहीन’ लोगों की पहचान और इस कदम के पीछे की मंशा पर संदेह है क्योंकि इसमें गहरी अनियमितताएं हैं।

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