पीलीभीत: भाजपा जिलाध्यक्ष की रेस में दिल्ली वाले नेताजी के करीबी दौड़े, तो घबराए कई दावेदार..जानिए क्या है मामला
वैभव शुक्ला, पीलीभीत, अमृत विचार। लोकसभा चुनाव 2024 का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है। राजनीतिक दल अभी से खुद को मजबूत बनाने के लिए जुट गए हैं। एक तरफ टिकट के दावेदारों की फेहरिस्त बढ़ रही है। वहीं, संगठन में पदाधिकारियों की बरकरारी और बदलाव को लेकर भी मंथन तेज है।
सत्ताधारी दल भाजपा में पिछले कुछ दिनों से जिलाध्यक्ष पद को लेकर सियासत ने खासा गरमाई हुई है। इसे लेकर तमाम नेता कतार में हैं और खुद के सिर ताज सजाने की जुगत में लगे हुए हैं। इन्हीं तमाम दावेदारों के बीच दिल्ली वाले नेताजी के करीबियों में पहचान रखने वाले एक नेताजी भी रेस में दौड़ गए हैं। कुछ ने तो उन्हें मजबूत दावेदार भी मान लिया है। फिलहाल हाईकमान का आशीर्वाद प्राप्त होता है, इसी पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
भाजपा जिला अध्यक्ष संजीव प्रताप सिंह का कार्यकाल पूर्ण हो चुका है। इसके बाद से ही पार्टी में जिलाध्यक्ष पद को लेकर सियासत तेज हो गई थी। एक-एक कर कई नाम सामने आते रहे और उनके मजबूत दावेदार होने की बात भी समर्थकों द्वारा खुलकर कही जाने लगी। मौजूदा जिलाध्यक्ष पर ही भरोसा जताते हुए उन्हें पुन:कमान सौंपे जाने की भी संभावनाएं इस दौरान जताई जाती रही है, तो कोई बदलाव तय बताकर दावे कर रहा है। इसे लेकर बीते दिनों हाईकमान से जिम्मेदार पदाधिकारी भी पीलीभीत आकर माहौल भांप गए थे।
मौजूदा जिलाध्यक्ष के अलावा, कई बड़े नाम इस रेस में शामिल रहे। सभी अपने-अपने स्तर से खुद को मजबूत साबित करने के लिए दौड़ भाग कर भी रहे हैं। दिग्गजों को मनाकर खुद की नैया पार लगाने की तैयारी भी की गई। खास बात है कि जातिगत आधार पर भी खुद की दावेदारी की मजबूती आंकी जा रही है। सामान्य वर्ग से संगठन में लंबे समय से जुड़े वैश्य और ब्राह्मण बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले नेताओं के नाम आगे होने की चर्चाएं चलती रही। वहीं, ओबीसी वर्ग से भी कई दावेदार हैं। जिलाध्यक्ष पद पाने के लिए राजनीतिक आकाओं की मदद भी ली जा रही है।
इसी बीच अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले भी दावेदार मैदान में हैं। इसमें एक दिल्ली वाली नेताजी के खासा करीबियों में पहचान रखते हैं। उनके नाम को लेकर भी पार्टी में चर्चाएं कम नहीं हैं। चूंकि नाम दिल्ली वाले नेताजी से जुड़ा चल रहा है इसलिए कई अन्य दावेदारों को चिंता यह भी है कि कहीं बाजी न मार ले जाएं। इसी वजह से पद की रेस में उन्हें आगे भी मानने से नहीं चूक रहे। फिलहाल कार्यकर्ता मौजूदा हालात को देखते हुए जिलाध्यक्ष के नाम को लेकर चुप्पी सी साध चुका है, ताकि बदलाव की स्थिति बने या फिर मौजूदा पदाधिकारी दोहराए और आगे उसके लिए कोई दिक्कत न आ जाए। संगठन के निर्णय को सर्वोपरि मानने की बात कहकर तमाम अटकलों पर विराम लगाने काम किया जा रहा है।
खुद के संघर्ष से लेकर दूसरे की कमजोरियों का भी डाटा तैयार
जिलाध्यक्ष पद पर किसकी ताजपोशी होगी यह तो वक्त बताएगा। मगर खुद को बेहतर साबित करने से अधिक जोर कही ना कहीं दूसरे को बेदम साबित करने पर अधिक है। जिस तरह से खुद के पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए किए गए संघर्ष का बायोडाटा तैयार किया। उसी तरह से दूसरे की कमजोरियों के चिठ्ठे भी बनाकर वरिष्ठ नेताओं के समक्ष रखने से गुरेज नहीं किया जा रहा है। फिर चाहे बगावती तेवर दिखाने की बात पूर्व में रही हो या फिर अन्य।
..तो इसलिए भी चिंता सताई
बता दें कि बीते सालों में भाजयुमो जिलाध्यक्ष के चयन को लेकर भी कुछ इसी तरह की स्थिति बनी। दो दिग्गजों के समर्थक अध्यक्ष की दौड़ में जुटे। एक संघर्ष को बयां करते हुए खुद को मजबूत साबित करने में जुटा रहा, वहीं दूसरा गुट भी खुद को पार्टी का सच्चा सिपाही बताता रहा। मगर जब नाम तय हुआ तो एक खेमे में मायूसी के साथ ही सोशल मीडिया पर विरोध भी सामने आया। यहां तक चर्चाएं तेज रही कि दिल्ली वाले नेताजी की सिफारिश काम कर गई। दूसरे खेमे से दावेदारी करने वाले खुद को पद न मिलने के पीछे इसी को वजह बता गए।
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