मेरी माटी मेरा देश: आज के दिन ही बापू ने किया था शहर में पैदल मार्च, 18 वर्ष के अंतराल में महात्मा गांधी सात बार आए कानपुर

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आज ही के दिन बापू ने शहर में पैदल मार्च किया था।

आज के दिन ही बापू ने शहर में पैदल मार्च किया था। वह 18 वर्ष के अंतराल में महात्मा गांधी सात बार कानपुर आए और उन्होंने 20 दिन भी प्रवास किया।

कानपुर, [मनोज त्रिपाठी]। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लोगों को आजादी के आंदोलन से जोड़ने और युवाओं में संघर्ष का जज्बा भरने के लिए नौ अगस्त को शहर में पैदल मार्च किया था। उनके साथ जुलूस के रूप में बड़ी संख्या में जनता शामिल हुई थी। यह घटना नौ अगस्त, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से ठीक 21 साल पहले की है। बापू शहर में चौथी बार 8 अगस्त 1921 को आए थे।

इसके अगले दिन वह पैदल ही निकल पड़े तो लोग पीछे दौड़ पड़े। नागरिक अभिनंदन में बापू ने साथ में फोटो खिंचवाने और आटोग्राफ लेने के लिए एक आना चंदा मांग लिया, बोले यह धन आजादी की लड़ाई में काम आएगा। फिर क्या था, हर कोई मुट्ठी में एक आना दबाकर आगे आने के लिए लालायित हो उठा। बापू ने जो मालाएं पहनाई गई थीं, उन्हें भी मौके पर नीलाम कर दिया।   

महात्मा गांधी का शहर से खास नाता और लगाव रहा। इसी के चलते वह 18 वर्ष के अंतराल में सात बार शहर आए और 19 से 20 दिन यहां प्रवास किया। पहली बार 31 दिसंबर 1916 को महात्मा गांधी का कानपुर में आना हुआ। उनका यह कार्यक्रम अचानक बना। दरअसल, लखनऊ में कांग्रेस पार्टी का महाधिवेशन था। इसमें गणेश शंकर विद्यार्थी भी शामिल होने गए थे।

महाधिवेशन समाप्त होने के बाद विद्यार्थी जी ने महात्मा गांधी और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से कानपुर चलने का आग्रह किया और अड़ गए। इसी के बाद 31 दिसंबर को बापू और तिलक कानपुर आए। लेकिन अंग्रेजों के डर से कोई उन्हें अपने यहां ठहराने को राजी नहीं हुआ।

इस पर बापू के रुकने का इंतजाम प्रताप अखबार के दफ्तर में किया गया। उस समय लोग बापू के मुकाबले  तिलक को ज्यादा जानते थे। बापू की पहचान गुजराती पगड़ी और लंबा कोट पहनने वाले मोहनदास करमचंद गांधी की थी। इस दौरे में लोकमान्य तिलक की अगुवाई में शहर में जुलूस निकल कर परेड में सभा की गई, लेकिन सभा में बापू का भाषण नहीं हुआ।  

बापू का शहर में दूसरा आगमन 21 जनवरी, 1920 को हुआ। इस बार वह प्रयाग में मोतीलाल नेहरू से मिलकर दिल्ली लौट रहे थे। प्रयाग से दिल्ली की ट्रेन कानपुर होकर जानी थी। बापू से कानपुर में रुककर स्वदेशी भंडार का उद्घाटन करने का निवेदन किया गया। यह पता चलने पर कि स्वदेशी भंडार खोलने के पीछे मौलाना हसरत मोहानी का प्रयास है, बापू आमंत्रण टाल नहीं सके। वर्ष 1920 में ही 14 अक्टूबर को बापू का तीसरी बार शहर आना हुआ, जबकि चौथी बार वह आठ अगस्त 1921 को यहां आए। 

…जब मलिन बस्ती में झाड़ू 
लगा स्वच्छता की अलख जगाई 

बापू पांचवीं बार 23 दिसंबर 1925 को कानपुर में कांग्रेस के 40वें महाधिवेशन में आए। आज जिस मोहल्ले को तिलक नगर कहा जाता है, वहीं यह महाधिवेशन आयोजित किया गया था। बापू का भाषण सुनने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ा। बाद में वह मलिन बस्तियों में गए और लोगों को स्वच्छता के लिए जागरूक करने के लिए खुद झाड़ू लगाई। बापू को झाड़ू लगाते देख हजारों लोग झाड़ू लेकर घरों से बाहर निकल आए थे। इसके चार साल बाद छठी बार 22 सितंबर 1929 को उनका कानपुर आना हुआ। 

तिलक हाल का उद्घाटन किया 
छुआछूत खत्म करने पर जोर

बापू की कानपुर की सातवीं और अंतिम यात्रा 22 जुलाई 1934 को हुई। इसी दिन परेड में हुई सभा में उन्होंने गंदगी साफ करने में सवर्णों की हिचक का जिक्र करते हुए कहा कि आंदोलन का लक्ष्य सिर्फ चंदे से पूरा नहीं होता। यह तो सवर्णो के दिल पिघलने से ही प्राप्त होगा। इस यात्रा के दौरान बापू शहर में पांच दिन ठहरे। 24 जुलाई को तिलक हाल का उद्घाटन किया। बाद में क्वींस पार्क (सीएसए) में  छात्रों व हरिजनों की सभा में कहा कि स्वच्छता सेवा का पवित्र कार्य है। गंदगी साफ करने वाले से उतनी ही घृणा करें, जितनी आप एक नर्स, डॉक्टर या मां से करते हैं। अगले दिन 25 जुलाई को आर्य प्रतिनिधि सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने खादी अपनाने पर जोर दिया। 

छावनी बने शहर में जगह-जगह
हुआ संघर्ष, फहराया गया तिरंगा 

आठ अगस्त, 1942 को बापू ने मुंबई में ‘करो या मरो’ का मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि हम या तो भारत को आज़ाद कराएंगे या कोशिश करते हुए मर जाएंगे, लेकिन अपनी गुलामी देखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे। इसी के बाद भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कर दी गई।  

कानपुर में तिलक हाल के पास श्रद्धानंद पार्क में आधी रात से ही लोग जुटने लगे। अंग्रेजों ने तिलक हाल घेरकर रात में ही 42 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। कई जगह छापे मारकर 90 और लोगों को दबोच लिया। नौ अगस्त की सुबह पार्क पहुंचे दर्जनों लोग गिरफ्तार कर लिए गए।

इस बीच स्कूल-कालेजों के छात्र अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगाते हुए सड़कों पर निकल पड़े। जगह-जगह तिरंगा फहरा दिया। नयागंज में छात्रों के जत्थे का अंग्रेज पुलिस से संघर्ष हुआ। यहां और मेस्टन रोड पर गोली चली। फूलबाग में हुई सभा में हजारों की भीड़ जुटी। पुलिस ने यहां आंसू गैस के गोले छोड़कर भीड़ को तितर-बितर किया।

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