बरेली: कंगाल नगर निगम में भी अफसरों के ऐश कम नहीं, अस्थाई बेलदारों का रुक गया वेतन...जानिए मामला

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Edited By Amrit Vichar
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ठेकेदारों का बकाया भुगतान रुकने से निर्माण कार्य बंद हुए तो 86 बेलदारों को अफसरों ने लगा लिया निजी कामों में

बरेली, अमृत विचार। अफसरों ने ही नगर निगम को इस कदर कंगाल कर डाला कि फिलहाल वह न जनता की जरूरतें पूरी करने लायक बचा है न अपने ऊपर लदा कर्ज का भारी बोझ उतारने में। फिर भी अफसरों के ऐश कम नहीं हुए हैं। हालत यह है कि 80 से ज्यादा स्थाई और अस्थाई बेलदारों को अफसरों ने निजी कामों में लगा रखा है। कोई उनकी गाड़ी चला रहा है तो किसी ने उनके घरेलू कामों की जिम्मेदारी संभाल रखी है। हद यह है कि यह सबकुछ लिखापढ़ी में आ चुका है, फिर भी इस पर अभी कोई रोक नहीं लग पाई है। इन बेलदारों पर नगर निगम करीब 25 लाख रुपये हर महीने खर्च कर रहा है।

नगर निगम पर ठेकेदारों का 60 करोड़ से ज्यादा का कर्ज है। दो साल से भी ज्यादा समय से बकाया भुगतान न मिलने की वजह से ठेकेदारों ने नगर निगम के कामों का बहिष्कार कर रखा है लिहाजा उसके इंजीनियरिंग विभाग के पास जनता के लिए कुछ करने के लिए कोई काम नहीं बचा है।

इसी वजह से नगर निगम में तैनात 56 स्थाई और 30 से ज्यादा अस्थाई बेलदार भी सरकारी काम से मुक्त हैं। साल भर से ज्यादा समय से इन बेलदारों की नौकरी अफसरों के निजी काम करने भर की रह गई है। कोई उनकी गाड़ी चला रहा है तो कोई घर के काम कर रहा है। इंजीनियरिंग विभाग के जेई से लेकर मुख्य अभियंता तक सभी ने एक नहीं बल्कि कई-कई बेलदारों को निजी सेवा में लगा रखा है।

बेलदार का स्थाई पद चतुर्थ श्रेणी का माना जाता है और नगर निगम करीब तीस हजार तक वेतन उन्हें देता है। अस्थाई बेलदार आउटसोर्सिंग एजेंसी के जरिए नगर निगम में रखे गए हैं जिन्हें चार सौ रुपये रोज के हिसाब से भुगतान किया जाता है। इस तरह 86 बेलदारों पर नगर निगम हर महीने 25 लाख रुपये से ज्यादा रकम खर्च कर रहा है। इंजीनियरिंग विभाग में तैनात इन बेलदारों की सरकारी जिम्मेदारी निर्माण कार्यों में इंजीनियरों के काम में हाथ बंटाने की होती है, लेकिन सरकारी काम ही नहीं है इसलिए वे अफसरों के काम कर रहे हैं।

स्टेटस सिंबल : जिसके पास जितने बेलदार, वो उतना ही पावरफुल
ठलुआ बेलदार नगर निगम में अफसरों के लिए स्टेटस सिंबल बन गए हैं। बेलदारों को निजी कामों के लिए लपकने की होड़ इस नौबत तक पहुंच गई है कि जिस अफसर के पास जितने ज्यादा बेलदार हों, वह उतना ही पावरफुल माना जा रहा है। सर्वाधिक आठ बेलदार एक जेई के पास हैं।

बाकी जेई और एई ने भी दो-दो बेलदार हथिया रखे हैं। पिछले दिनों निलंबित हुए मुख्य अभियंता बीके सिंह के घर पर भी चार बेलदार लगे हुए थे। उन्हें नगर निगम की ओर से भी ड्राइवर समेत सरकारी गाड़ी मिली हुई थी लेकिन फिर भी उन्होंने एक बेलदार को अतिरिक्त ड्राइवर के तौर पर रखा हुआ था। दिलचस्प यह है कि एक जेई को कोई बेलदार नहीं मिल पाया तो उसने बाकायदा नगर आयुक्त से इसकी शिकायत भी कर डाली। इस तरह इंजीनियरिंग विभाग में बेलदारों को लेकर चल रही खींचतान नगर आयुक्त तक भी पहुंच गई। हालांकि अब भी स्थिति जस की तस है।

कार्य विवरण मांगा तो पता चला कि कितने बेलदार किसके पास
बेलदारों को लेकर खींचतान जगजाहिर होने के बाद पिछले दिनों इंजीनियरिंग विभाग के अफसरों से बेलदारों की तैनाती का विवरण मांगा गया तो सबकुछ लगभग साफ हो गया।

इस कार्य विवरण में कई जगह साफ तौर पर लिखा गया है कि कितने बेलदार किस एई या जेई के पास ड्राइवर के रूप में काम कर रहे हैं। हालांकि यह भी दिलचस्प है कि एई या जेई सरकारी वाहन रखने के लिए ही अधिकृत नहीं हैं। इसके बावजूद कार्य विवरण में किसी एई-जेई ने एक-एक तो किसी ने दो-दो बेलदारों से ड्राइवर का काम लिए जाने की बात लिख डाली।

अस्थाई बेलदारों का रुक गया वेतन
नगर आयुक्त निधि गुप्ता वत्स से यह भी शिकायत की गई है कि बेलदारों को वेतन न मिलने से काम प्रभावित हो रहा है। नगर आयुक्त ने जांच कराई तो पता चला कि इंजीनियरों के बेलदारों के कार्य विवरण में उनसे ड्राइवर का काम लेने की बात लिखने के कारण आपत्ति लगाई गई, इसी कारण बेलदारों को वेतन नहीं मिल पा रहा है।

इसी बीच पिछले दिनों बेलदारों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए नगर आयुक्त ने दिसंबर में अपने कार्यालय में उनकी परेड कराई तो 30 अस्थाई बेलदारों में से कई सामने ही नहीं आए। उस वक्त उनका वेतन निकल रहा था मगर जनवरी से उनका वेतन निकलना बंद हो गया।

तमाम सफाईकर्मी पहले से लगे हैं घरेलू कामों में
बेलदार तो अफसरों ने अब हथियाएं हैं लेकिन नगर निगम के तमाम सफाईकर्मी तो कई सालों से अफसरों की निजी सेवा में लगे हुए हैं। जब भी शहर में सफाई व्यवस्था ठप होने का मामला उठता है तो सफाईकर्मियों के दुरुपयोग का भी मामला उठता है लेकिन फिर भी नगर निगम या प्रशासन का कोई उच्चाधिकारी और शहर को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने का दावा करने वाले विकास पुरुष इसका संज्ञान लेने को तैयार हैं। कई बार नगर निगम बोर्ड की बैठकों में भी यह मामला उठ चुका है लेकिन फिर भी कुछ नहीं हो पाया। इसके बजाय निजी एजेंसी के जरिए सफाई कराने पर मोटी रकम फूंकी जा रही है।

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