बरेली: 45 बरस में खड़े हो गए 14 संगठन...व्यापारी हितों से ज्यादा खुद की महत्वाकांक्षाएं हावी
कुतुबखाना पुल: व्यापारी एकता बिखरने का स्मारक भी
बरेली, अमृत विचार। जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के साथ सेतु निगम के अधिकारियों ने भी सितंबर 2022 में बलपूर्वक कुतुबखाना पुल का निर्माण शुरू कराने से पहले मार्च 2023 तक यानी छह महीने के अंदर उसे पूरा करने का दावा किया था लेकिन अब 11 महीने निकलने के बाद एक बार फिर यह समयसीमा बढ़ा दी है। सेतु निगम ने पुल के निर्माण में आ रही तमाम दिक्कतें गिनाते हुए अब दिसंबर तक निर्माण पूरा करने का दावा किया है। हालांकि जिस गति से अब तक निर्माण चला है, उसके हिसाब से देखा जाए तो दिसंबर तक भी किसी हालत में निर्माण पूरा होता नहीं दिख रहा है।
कोतवाली के पास से कोहाड़ापीर तक 1307 मीटर लंबे कुतुबखाना पुल का निर्माण स्मार्ट सिटी कंपनी के बजट से हो रहा है। स्मार्ट सिटी की ओर से पिछले 11 महीनों में करीब 44 प्रतिशत बजट सेतु निगम को दिया गया है और सेतु निगम ने इससे पुल का अब तक करीब 38 प्रतिशत निर्माण किया है। यह पुल बनाने में शुरू से काफी दिलचस्पी दिखा रहे जनप्रतिनिधि तो अब काफी समय से उसका हाल लेने नहीं पहुंचे हैं। स्मार्ट सिटी की सीईओ निधि गुप्ता वत्स जरूर लगातार दौरा कर सेतु निगम पर जल्द निर्माण पूरा करने का दबाव बनाए लेकिन इस दबाव का कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है और पुल के निर्माण की रफ्तार नहीं बढ़ पा रही है।
अब सेतु निगम के डीपीएम अरुण कुमार ने भी साफ कर दिया है कि अक्टूबर तक कुतुबखाना पुल का निर्माण पूरा नहीं हो पाएगा। उन्होंने अब दिसंबर तक निर्माण पूरा करने का दावा किया है। डीपीएम के मुताबिक पुल का निर्माण जहां चल रहा है, वहां पर्याप्त जगह नहीं है। इसलिए काम भी तेजी से नहीं हो पा रहा है। कंक्रीट के साथ दूसरा सामान साइट तक ले जाने में काफी दिक्कत हो रही है। जगह इतनी कम है कि लेबर बढ़ाने का भी कोई नतीजा निकलने वाला नहीं है। इसलिए पुल का निर्माण करने में ज्यादा समय लग रहा है।
सियासत के बाजार में बिक गए एकता के सपने व्यापार मंडल में अब वो बात कहां... वर्ना बनताही नहीं या बन चुका होता कुतुबखाना पुल
व्यापारी नेताओं के दावे चाहे जो हों, लेकिन आम व्यापारियों के लिए व्यापारी एकता के नाम पर सिर्फ यादें बची हैं। करीब 45 साल पहले व्यापार मंडल के वजूद में आने के बाद व्यापारियों के हितों के लिए हुए तमाम बड़े आंदोलन उनके जेहन में अब भी कौंधते हैं, साथ ही इस बात का मलाल भी कि व्यापारियों के सिर पर समस्याओं का बोझ होने के बावजूद अब कोई आंदोलन नहीं होता। होता भी है तो दिखावे के लिए और सियासी हितों का पूरा ख्याल रखकर। व्यापारी साफ कहते हैं कि सियासी महत्वाकांक्षाओं ने ही एक व्यापार मंडल के एक-एक कर 14 टुकड़े कर डाले।
सिर्फ कुतुबखाना पुल नहीं, व्यापारियों की तमाम और समस्याएं हैं जिन पर उन्हें व्यापारी संगठनों से काफी उम्मीदें थीं जो एक-एक कर टूटती रहीं। तमाम व्यापारियों का कहना है कि उनके हितों के संरक्षण का दावा करने वाले संगठनों का जोर अब अफसरों और नेताओं से नजदीकी बढ़ाने पर ज्यादा रहता है ताकि सियासत और अफसरशाही में दबदबा बने रहने के साथ उनकी निजी महत्वाकांक्षाएं भी पूरी होती रहें।
व्यापारी कहते हैं कि आज के समय में फुटकर और थोक कारोबार करने वाले दोनों व्यापारियों के सामने कई तरह की समस्याएं हैं लेकिन कोई संगठन इन पर मुखर नहीं है। नए-नए कई संगठन बन गए हैं लेकिन दो-चार ही सक्रिय हैं। व्यापारियों का कहना है कि अगर बरेली में व्यापारी एकता का नामोनिशान भी होता तो व्यापारियों के विरोध के बाद कुतुबखाना पुल या तो बनता ही नहीं या फिर तय समय में बनकर पूरा हो चुका होता।
2010 के बाद खत्म हो गया संघर्ष का दौर
अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष 66 वर्षीय सुरेंद्र रस्तोगी बताते हैं कि वह सन् 1995 से व्यापार मंडल से जुड़े हैं। 1978 में संगठन बनाने वाले कानपुर के विशंभर नाथ की दो साल बाद माैत हो गई थी। इसके बाद श्याम बिहारी मिश्रा राष्ट्रीय अध्यक्ष और बनवारी लाल कंछल महामंत्री बने। लंबे समय तक संगठन चला। 1990 में संदीप बंसल ने अलग संगठन बना लिया। 2004 में बरेली के चुनाव में विवाद के बाद बनवारी लाल कंछल ने भी अलग संगठन बना लिया। इसके बाद नए-नए संगठन बनते चले गए। सुरेंद्र के मुताबिक 2000 से 2009 तक व्यापारी संगठन संघर्ष करते थे। अधिकारी भी उनकी गंभीरता से सुनते थे। लेकिन इसके बाद व्यापारी नेताओं पर उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हावी हो गईं और वे अफसरशाही और नेताओं के आगे नतमस्तक हो गए।
करीब साल भर से दिक्कतें झेल रहे व्यापारियों के चेहरों पर झलकती है पीड़ा
सितंबर 2022 में पुलिस के डंडे के जोर पर कुतुबखाना पुल का निर्माण शुरू तो करा दिया गया था लेकिन यह निर्माण पूरा कब होगा, अब इस बारे में कोई निश्चित दावा नहीं है। शुरुआती दौर में पुल का विरोध कर रहे व्यापारियों को बहलाने के लिए छह महीने के अंदर निर्माण पूरा करने का दावा किया गया था। इस हिसाब से मार्च तक पुल बन जाना था लेकिन फिर जून और जून के बाद अक्तूबर की डेडलाइन तय की। अब नई घोषणा दिसंबर तक निर्माण पूरा करने की है। वैसे तो ज्यादातर सरकारी परियोजनाएं रेंग-रेंगकर इसी तरह पूरी होती हैं, यह पुल भी कभी न कभी पूरा हो जाएगा लेकिन पूरा होने के बाद बरेली में व्यापारी एकता के बिखरने का गवाह बना रहेगा। बरेली में ऐसा संभवत: पहली बार है कि इस पुल की वजह से करीब 15 हजार व्यापारी प्रभावित हैं लेकिन इसके बावजूद व्यापार संगठनों में खामोशी छाई हुई है। प्रभावित व्यापारी इस खामोशी से कितना आहत हैं, यह कुतुबखाना पुल बनने में हो रही देरी का जिक्र आते ही उनके चेहरों पर साफ झलकने लगता है।
ये समस्याएं भी व्यापारियों का सिरदर्द
-सड़कों पर यातायात और जाम की समस्या ने कई इलाकों में व्यापार को चौपट कर दिया है।
-शहर में 10 साल से पार्किंग की मांग हो रही है। मेयर उमेश गौतम भी वादा करके भूल गए।
-बारिश में मुख्य बाजारों में जलभराव से कारोबार प्रभावित होता है, फिर भी कोई आवाज उठाने वाला नहीं।
-जीएसटी सैकड़ों व्यापारियों का सिरदर्द है, व्यापार संगठन इसको लेकर कोई दबाव नहीं बना पा रहे।
-कुतुबखाना पुल का निर्माण पूरा न होने से व्यापार प्रभावित हो रहा है, फिर भी कोई नहीं बोल रहा है।
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