सेप्सिस बीमारी को लेकर लोगों को जागरुक करना जरूरी : प्रो. सोनिया नित्यानंद
लखनऊ, अमृत विचार। सेप्सिस एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है, जो सालाना करोड़ों लोगों को प्रभावित करती है। सेप्सिस के इलाज के लिए बीमारी की पहचान करना सबसे जरूरी है। यह कहना है केजीएमयू की कुलपति प्रो.सोनिया नित्यानंद का। वह बुधवार को केजीएमयू स्थित पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की तरफ से आयोजित सेप्सिस अपडेट 2023 को संबोधित कर रही थीं।
उन्होंने बताया कि सेप्सिस के इलाज के लिये एक साक्ष्य आधारित द्रष्टिकोण तथा इलाज की जरूरत होती है। सेप्सिस की रोकथाम के लिये सबसे जरूरी यह है कि जनमानस को सेप्सिस के प्रारम्भिक लक्षणों के बारे में जागरुक किया जाये। सभी लोग अपने स्वास्थ्य को अपने दैनिक और व्यवसायिक कार्यों से ज्यादा महत्व दें एवं अपने शरीर की प्रतिरक्षा तंत्र को बढाने के लिये संतुलित आहार, व्यायाम, एवं साफ सफाई का ध्यान रखें। अपने वातावरण को साफ सुथरा बनाकर रखें। पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की तरफ से सेप्सिस अपडेट 2023 का आयोजन किया गया था । इस एक दिवसीय कार्यक्रम में सेप्सिस को लेकर विशेषज्ञों ने जागरूकता फैलाने का प्रयास किया।
कार्यक्रम में केजीएमयू की कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद मुख्य अतिथि रहीं। केजीएमयू के वाइस चांसलर प्रोफेसर विनीत शर्मा और अकादमिक डीन प्रोफेसर अमिता जैन सम्मानित अतिथि रहीं। वरिष्ठ यूरोलाजिस्ट प्रोफेसर विश्वजीत सिंह कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि रहे। वहीं सेप्सिस अपडेट 2023 कार्यक्रम के आयोजन अध्यक्ष प्रोफेसर राजेन्द्र प्रसाद एवं आयोजन सचिव के रूप में प्रोफेसर वेद प्रकाश उपस्थित रहे।
केजीएमयू स्थित पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो वेद प्रकाश ने बताया कि सेप्सिस के खिलाफ लड़ाई के लिये यह जरुरी है कि हम एण्टीबायोटिक्स का इस्तेमाल विवेकपूर्वक करें। सही समय पर सही एण्टीबायोटिक्स का इस्तेमाल ही काफी नही है, अपितु यह भी जानना है कि इसका इस्तेमाल कब नहीं करना है। प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि सेप्सिस प्रबंधन में शीघ्र पहचान और समय पर हस्तक्षेप करना चाहिए। सेप्सिस की कोई सीमा नहीं होती और यह किसी को भी प्रभावित कर सकता है।
लोहिया संस्थान के डॉ विक्रम सिंह ने सेप्सिस से होने वाली गुर्दे की बीमारी पर अपना व्यक्तव्य दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एकेआई सेप्सिस का इलाज समुचित रूप से करने से गुर्दे की क्षति को बचाया जा सकता है। उन्होंने सेप्सिस में किडनी की क्षति को कम करने के लिए शीघ्र पहचान और हस्तक्षेप के महत्व पर प्रकाश डाला।
प्रोफेसर आर के सिंह ने सेप्सिस प्रबंधन में बायोमार्कर पर अपना व्यक्तव्य दिया। उन्होंने प्रारंभिक सेप्सिस का पता लगाने में बायोमार्कर के महत्व पर जोर दिया। उन्होने इस बात पर जोर दिया कि बायोमार्कर का उपयोग न केवल शीघ्र निदान में सहायता करता है बल्कि उपचार निर्णयों का मार्गदर्शन भी करता है।
माइक्रोबायोलॉजी की हेड और केजीएमयू में डीन एकेडमिक्स डॉ अमिता जैन ने सिंड्रोमिक परीक्षण पर प्रकाश डाला उन्होंने संक्रामक रोग निदान के क्षेत्र में सिंड्रोमिक परीक्षण की जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि यह टेस्ट एक साथ कई बीमारियों और एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीवों का पता लगाने में सक्षम बनाता है, जो उपचार निर्णयों के मार्गदर्शन के लिए महत्वपूर्ण त्वरित और सटीक परिणम प्रदान करता है। माइक्रोबायोलॉजी की प्रोफेसर डॉ विमला वेंकटेश ने एंटीबायोटिक प्रबंधन कार्यक्रम इन जीवन रक्षक दवाओं की प्रभवशीलता को बनाए रखने और एंटीबायोटिक - प्रतिरोधी जीवों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जोकि सेप्सिस के मामलों में बढ़ती चिंता का विषय है। यूरोलॉजी के जाने-माने प्रोफेसर विश्वजीत सिंह ने मूत्र मार्ग के संक्रमण पर अपनी चर्चा के दौरान बहुमूल्य जानकारियां साझा की। उन्होंने मूत्र पथ के संक्रमण (यूटीआई) और यूरोसेप्सिस के दुष्प्रभात पर प्रकाश डाला, जो एक जीवन - घातक स्थिति पैदा कर सकती है। उन्होंने यूरोसेप्सिस के शीघ्र निदान और उचित प्रबंधन के महत्व पर जानकारी साझा की।
सेप्टिसीमिया का अर्थ है
प्रोफेसर वेद प्रकाश ने बताया कि सेप्टिसीमिया खून में संक्रमण की वजह से शरीर के विभिन्न अंगों में नुकसान होता है जिससे ब्लड प्रेशर में कमी, अंगो का निष्क्रिय होना (मल्टी आर्गन फेल्योर) हो सकता है। अगर सही समय पर इसकी पहचान एवं उपचार ना किया जाये तो इससे मृत्यु भी हो सकती है।
महत्वपूर्ण तथ्य
सेप्सिस सभी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है। प्रतिवर्ष 5 करोड़ लोग इससे ग्रसित होते है। इसमें 40 प्रतिशत मामले, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चो में होते हैं। पूरे विश्व में सेप्सिस के कारण प्रतिवर्ष लगभग 01 करोड 10 लाख लोगो की मृत्यु होती है। दुनिया भर में 5 में से 1 मृत्यु सेप्सिस से होती है एवं अस्पतालों में होने वाली मृत्यु में सबसे बडा कारण सेप्सिस है। सेप्सिस से सबसे ज्यादा मृत्यु बुजुर्ग एवं बच्चों में होती है।
सेप्सिस के प्रमुख कारण
निमोनिया, मूत्र मार्ग में संक्रमण, सर्जिकल साइट संक्रमण इत्यादि। सेप्सिस का जोखिम - कैंसर डायबिटीज आदि जैसी प्रतिरक्षा तंत्र कम करने वाली बीमारियों के ग्रजित लोगों में सबसे ज्यादा होता है। भारत में एक वर्ष में लगभग 1 करोड 15 लाख लोग सेप्सिस से ग्रसित होते हैं, लगभग 30 लाख लोगों की मृत्यु इससे होती है। भारत में सेप्सिस की मुत्यु दर प्रति लाख व्यक्ति है। एक अध्ययन के हिसाब से आईसीयू में 50 प्रतिशत से ज्यादा व्यक्ति सेप्सिस से ग्रसित रहते हैं जिसमें 45 प्रतिशत मामलें मल्टी ड्रग रेजिस्टेन्ट बैक्टीरिया के होते हैं।
सेप्सिस के कारण
यह विभिन्न कारणो से होती है। जिसमें बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण सबसे प्रमुख है। यह सेप्सिस का सबसे प्रमुख कारण है। यह विभिन्न प्रकार से हो सकता है, जैसे फेफडों का संक्रमण (निमोनिया), पेशाब के रास्ते का संक्रमण (यूटीआई), त्वचा एवं अन्य अंगों का संक्रमण इत्यादि। वायरल संक्रमण इसके उदाहरणों में- फ्लू (इन्फ्लूएंजा), एचआईवी, कोविड, डेंगू वायरस इत्यादि है।
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