इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी, पोस्ट ऑफिस की तरह कार्य न करें जिला अदालतें
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र पर भरोसा करते हुए हाथरस अदालत द्वारा डिस्चार्ज अर्जी को खारिज करने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि डिस्चार्ज अर्जी पर फैसला करते समय ट्रायल कोर्ट ने शीर्ष अदालत द्वारा निर्धारित कानून के नियमों का पालन नहीं किया है।
उपरोक्त मामले में डिस्चार्ज आवेदन खारिज करने के बाद आरोप तय किए गए। प्राथमिकी में लगाए गए आरोप तथा बयानों पर विचार करने के बाद यह तथ्य सामने आता है कि आईपीसी की धारा 386 और 389 के तहत कोई मामला नहीं बनता है, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने पोस्ट ऑफिस की तरह काम करते हुए आरोप पत्र स्वीकार कर लिया और सभी तथ्यों को सत्य मानकर डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी।
गौरतलब है कि याचियों के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। इसके बाद जांच अधिकारी ने याचियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 386, 389, 452, 504 और 506 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया। आरोप तय होने से पहले आवेदकों ने डिस्चार्ज अर्जी दाखिल की, जिसे खारिज कर दिया गया।
वास्तव में ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई कार्यवाही सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ विभिन्न न्यायालयों द्वारा तय किए गए न्यायिक दृष्टिकोणों के गैर अनुप्रयोग का परिणाम है। मौजूदा मामले में अत्यंत अनौपचारिक ढंग से आक्षेपित आदेशों के माध्यम से डिस्चार्ज आवेदन को खारिज कर दिया गया है और आरोप तय किए गए हैं। अंत में न्यायमूर्ति नीरज तिवारी की एकलपीठ ने संजीव रावत उर्फ टीटू व अन्य की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
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