लखनऊ : सड़क दुर्घटनाओं में नहीं आ रही कमी, केजीएमयू के ट्रामा सेंटर में रोजाना आ रहे 100 से अधिक मरीज
लखनऊ, अमृत विचार। दुनियाभर में 17 अक्टूबर को विश्व ट्रॉमा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को मनाने के पीछे का मकसद ट्रॉमा के कारणों की रोकथाम के लिए लोगों को जागरुक करना है। ट्रॉमा की वजह से हर उम्र के लोग प्रभावित हो सकते हैं। विश्व ट्रॉमा दिवस के मौके पर लोगों को अचानक हुई किसी दुर्घटना की स्थिति में बचने के प्रति जागरुक किया जाता है। विशेषज्ञों की माने तो अचानक हुई दुर्घटनाओं में सड़क हादसा और हार्ट अटैक जानलेवा साबित होता है।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों की माने तों हर साल एक लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटना में अपनी जान गवां देते हैं। वहीं विश्व में हृदय की बीमारियों से होने वाली मौतों के आंकड़े परेशान करने वाले हैं। इन आंकाड़ों की माने तो अचानक हुई मौतों में सबसे बड़े कारणों में सड़क दुर्घटना और हार्ट अटैक बताया जा रहा है। वहीं सड़क दुर्घटना में मौत की सबसे बड़ी वजह ब्रेन इंजरी है। बात करें राजधानी लखनऊ की तो यहां पर स्थित केजीएमयू के ट्रामा सेंटर में हर महीनें तीन सौ के करीब ऐसे मरीज आते हैं जिन्हें वेंटीलेटर की जरूरत होती है। यह वह मरीज होते हैं जिनकी हालत दुर्घटना के बाद अति गंभीर हो जाती है। यह आंकड़ें सड़क हादासे की गंभीरता को बताने के लिए काफी है।
किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय स्थित ट्रामा सेंटर में पूरे प्रदेश से इलाज के लिए मरीज पहुंचते हैं। ट्रामा प्रभारी प्रो.संदीप तिवारी के मुताबिक करीब 100 से 120 मरीज रोजाना दुर्घटना में घायल होकर इलाज के लिए पहुंचते हैं। उनमें से करीब 80 मरीजों की हालत गंभीर होने पर भर्ती कर इलाज दिया जाता है। बाकी मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद घर भेजा जाता है। वहीं जिन 80 मरीजों को भर्ती कर इलाज दिया जाता है, उनमें से 50 मरीज गंभीर हालत में होते हैं। इनमें से भी 8 से 10 मरीज अति गंभीर हालत में होते हैं, जिन्हें वेंटीलेटर की जरूरत होती है।
कृत्रिम सांस से बचाई जाती है मरीजों की जान
डॉ. संदीप तिवारी बताते है कि यहां पर कई बार ऐसा होता है कि मरीज बहुत ही गंभीर स्थित में ट्रामा पहुंचते है, जिन्हें एंबु बैग लगाना पड़ता है और सीपीआर देना पड़ता है। जिससे उनकी जान बच जाती है। केजीएमयू का ट्रामा सेंटर अन्तर्राष्ट्रीय मानक पर काम करता है। जिसके चलते ट्रामा सेंटर में पहुंचने वाले घायल मरीजों में से करीब 87 फीसदी मरीजों की जान बचा ली जाती है। अमेरिका जैसे देश में भी 10 से 15 फीसदी घायल मरीजों की जान अस्पताल पहुंचने के बाद चली जाती है।
क्या करें और क्या न करें
डॉ. संदीप तिवारी की माने तो व्यक्ति को रोजाना एक्सरसाइज करनी चाहिए। इससे शरीर फिट रहे। कार चलाते समय सीट बेल्ट जरूर लगाएं। बाइक या फिर साइकिल चलाते समय हेलमेट जरूर लगाएं। गाड़ी चलाते समय अल्कोहल का सेवन न करें। आंखों की कमजोरी यानी की द्ष्टि में दिक्कत हो तो चिकित्सक से सलाह लें। हार्ट अटैक आने पर अस्पताल पहुंचे या नजदीकी डॉक्टर से संपर्क करें।
सीपीआर ट्रेनिक की जरूरत
उन्होंने सीपीआर तकनीक की जानकारी भी दी, कहा कि सीपीआर कृत्रिम सांस देने की प्रक्रिया है, लेकिन यह प्रशिक्षित व्यक्ति ही दे सकता है। इसलिए सभी लोगों को सीपीआर सीखना चाहिए।
केजीएमयू में 10 हजार लोगों को मिल चुकी है बीएलएस ट्रेनिंग
राजधानी के केजीएमयू यानी किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रजनी गुप्ता ने बताया कि केजीएमयू के डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर समेत अन्य लोगों को मिलाकर करीब 10 हजार लोगों को बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) की ट्रेनिक दी गई है। जिसका लाभ भी कई बार देखने को मिला है। कई बार मरीजों की जान बीएलएस का प्रशिक्षण ले चुके लोगों ने बचाई है। दुर्घटनाग्रस्त या गंभीर अवस्था में अस्पताल आए मरीजों की जान बचाने में बीएलएस खासी अहम भूमिका निभाता है। बीएलएस के प्रशिक्षण में मरीज को सांस देने, सीने को पंप करने जैसी प्रक्रियाओं के बारे में बताया जाता है। वहीं एडवांस ट्रामा लाइफ सपोर्ट (एटीएलएस) में बीएलएस से अधिक उच्चस्तरीय ट्रेनिंग दी जाती है।
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