बरेली: मंडलायुक्त की पहल...पराली अब खेतों में नहीं जलेगी, फसल की तरह बिकेगी
किसानों से 17.5 हजार टन पराली की सप्लाई दातागंज में लगे कंप्रेस्ड बायो गैस प्लांट को सप्लाई करने का अनुबंध
फोटो- सौम्या अग्रवाल, कमिश्नर।
बरेली, अमृत विचार। वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों में शुमार होने वाली पराली कुछ समय बाद मंडल के किसानों के लिए एक अतिरिक्त फसल जितनी कमाई का साधन बन सकती है। दरअसल, पराली का इस्तेमाल कंप्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) बनाने में किया जाएगा।
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मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल की पहल के बाद बदायूं के दातागंज में हिंदुस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड की ओर से स्थापित सीबीजी प्लांट के लिए तो पराली की सप्लाई का रास्ता साफ हुआ ही है, इसके साथ मारुति, रिलायंस, आयुषी जैसी कई और कंपनियों से मंडल में सीबीजी प्लांट लगाने की बात शुरू हो गई है। जल्द इसके ठोस नतीजे निकलने की उम्मीद जताई जा रही है।
दातागंज में 120 करोड़ की लागत से कृषि अपशिष्ट से कंप्रेस्ड बायो गैस बनाने का प्लांट 2021 में बनकर तैयार हो गया था। इसे पिछले साल शुरू हो जाना था लेकिन उसे पराली ही नहीं मिल पाई। कुछ समय पहले कंपनी के अधिकारियों ने अपनी यह समस्या मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल के सामने रखी। पराली के प्रबंधन के लिए सुप्रीम कोर्ट और शासन के भारी दबाव के बीच मंडलायुक्त को एचपीसीएल की यह समस्या खुशखबरी की तरह लगी।
उनकी पहल पर कई बड़े किसानों ने एचपीसीएल को पराली देने का अनुबंध किया है। एचपीसीएल को हर साल 35 हजार टन पराली की जरूरत है। मंडलायुक्त के दिलचस्पी दिखाने के बाद अब तक साढ़े 17 हजार टन पराली की सप्लाई का अनुबंध हो चुका है।
मंडलायुक्त के निर्देश पर एचपीसीएल के बाद अब कई दूसरी कंपनियों से भी बरेली मंडल में सीबीजी प्लांट लगाने की बातचीत शुरू हुई है। इनमें मारुति, रिलायंस, आयुषी आदि कंपनियां प्रमुख हैं। बताया जा रहा है कि ये कंपनियां बरेली में प्लांट लगाने में दिलचस्पी ले रही हैं लेकिन पराली की पर्याप्त उपलब्धता और माकूल रेट सुनिश्चित कर लेना चाहती हैं।
कंपनियों की इन्हीं शर्तों पर फिलहाल बातचीत चल रही है जो निर्णायक स्तर तक पहुंची तो पराली जलाने की समस्या के खात्मे के साथ किसानों की कमाई का भी रास्ता खुल जाएगा। मंडलायुक्त के स्तर पर यह प्रस्ताव भी राज्य सरकार को भेजे जाने की तैयारी है कि धान के किसानों के पंजीकरण के समय ही उनसे पराली के उपयोग की जानकारी ली जाए और अगर वे उसे बेचने के लिए सहमत हों तो उनसे करार कर लिया जाए।
पराली मंडी एप आसान करेगा किसानों-कंपनियों की राह
पराली की खरीदार कंपनियों की सबसे बड़ी दिक्कत है कि वे किस इलाके में किसानों से संपर्क करें। मंडलायुक्त ने इस समस्या को दूर करने के लिए पराली मंडी एप लांच कराया है जो सोमवार तक लाइव हो जाएगा। फिलहाल इस एप पर मंडल के सभी किसानों की फीडिंग चल रही है।
इस एप में किसानों का नाम, उनका क्षेत्र, मोबाइल नंबर, फसल कब कटेगी, पराली कब तैयार हो जाएगी जैसी जानकारी फीड की जा रही हैं। इसके बाद एप की मदद से कंपनियां किसानों से सीधे संपर्क करके भी पराली खरीद सकेंगी।
27.5 लाख टन पराली हर साल घोलती है आबोहवा में जहर
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मंडल के बरेली, बदायूं, पीलीभीत और शाहजहांपुर जिलों में हर साल करीब 5.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान का उत्पादन होता है। एक हेक्टेयर में कम से कम पांच टन पराली निकलती है। इस हिसाब से मंडल में हर साल करीब 27.5 लाख टन निकलती है, जिसमें से किसान कुछ हिस्सा अपने पशुओं के लिए रखते हैं, बाकी को जला देते हैं जो आबोहवा में जहर घोलने का काम करती है।
एक सीबीजी प्लांट को हर साल औसतन 35 हजार टन पराली की जरूरत होती है। ऐसे में अगर शत-प्रतिशत पराली उन्हें दे दी जाए तो कई प्लांट लगाए जा सकते हैं। इससे किसानों की आय तो बढ़ेगी ही, प्रशासन की समस्या भी दूर होगी। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक मंडल में करीब एक लाख 17 हजार धान किसान पंजीकृत हैं।
बरेली मंडल से पराली को जलाने की समस्या जड़ से खत्म करने की कोशिश है। कई और प्राइवेट कंपनियां कम्प्रेस्ड बायो गैस प्लांट लगाने के लिए इच्छुक हैं। पराली मंडी एप से काफी हद तक समस्याओं का निदान हो सकेगा। कंपनियों से बातचीत चल रही है--- सौम्या अग्रवाल, मंडलायुक्त।
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