Allahabad High Court: सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी मामले में नियम निर्माण के लिए सरकार को दिया अतिरिक्त समय
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी (एसआरएस) के मामले में नियम बनाने के लिए राज्य सरकार को एक महीने का अतिरिक्त समय देते हुए याचिका को 5 जनवरी के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से अनुपालन हलफनामा दाखिल किया गया और कोर्ट को यह बताया गया कि याची की सेक्स चेंज अर्जी निरस्त कर दी गई है।
इस पर कोर्ट ने याची के अधिवक्ता को वर्तमान याचिका में संशोधन अर्जी दाखिल कर पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश लखनऊ के आदेश को चुनौती देने की अनुमति दी है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति अजीत कुमार की एकल पीठ ने याची महिला कांस्टेबल नेहा सिंह की याचिका पर लिंग परिवर्तन की अनुमति की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया है।
कोर्ट ने राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ व अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए राज्य सरकार को सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी के संदर्भ में नियम बनाने के लिए कहा था। इस पर कोर्ट ने पिछली तारीख पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा याची के लंबित आवेदन पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया था जिसे खारिज कर दिया गया।
गौरतलब है कि कोर्ट ने गत 18 अगस्त के अपने आदेश में मुख्य रूप से कहा था कि लिंग परिवर्तन कराना संवैधानिक अधिकार है। अगर आधुनिक समाज में किसी व्यक्ति को अपनी पहचान बदलने के इस अधिकार से वंचित किया जाता है तो उसके मूल अधिकारों का हनन होगा। आदेश में आगे यह भी कहा गया था कि लिंग पहचान विकार सिंड्रोम कभी-कभी बेहद घातक हो सकती है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति विकार, चिंता, अवसाद, नकारात्मक छवि और किसी की यौन शारीरिक रचना के प्रति नापसंदगी से पीड़ित हो सकता है।
महिला सिपाही नेहा सिंह की तरफ से अधिवक्ता ने तर्क देते हुए कोर्ट में कहा था कि वह जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित है। लिहाजा वह अपना लिंग परिवर्तन करना चाहती है। इसी संदर्भ में नेहा ने पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को 11 मार्च 2023 को अपना प्रत्यावेदन देकर लिंग परिवर्तन की अनुमति मांगी थी।
इस प्रार्थना पत्र पर काफी समय से कोई निर्णय न लिए जाने और विलंब होने पर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में लिंग पहचान को व्यक्ति की गरिमा का अभिन्न अंग माना गया है। यदि उत्तर प्रदेश में ऐसा नियम नहीं है तो राज्य को केंद्रीय कानून के मुताबिक अधिनियम बनाना चाहिए।
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