बांदा : महिला सिविल जज ने इच्छा मृत्यु मांगकर न्याय व्यवस्था पर ही खड़ा किया सवाल - वायरल हो रहा पत्र
बाराबंकी में तैनाती के दौरान तत्कालीन जिला जज पर लगाया था यौन उत्पीड़न का आरोप
बांदा,अमृत विचार। न्याय की कुर्सी पर बैठकर पीड़ितों को न्याय दिलाने वाली यौन उत्पीड़न की शिकार एक न्यायाधीश ने इच्छा मृत्यु मांग कर भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। जनपद की एक अदालत में तैनात महिला सिविल जज के नाम से गुरुवार को एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें महिला जज ने यौन उत्पीड़न की घटना से परेशान होकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगने का जिक्र है। वायरल पत्र में पीड़ित सिविल जज ने अपने ही उच्चाधिकारी पर यौन उत्पीड़न और प्रताड़ित करने का गंभीर आरोप लगाया है। हालांकि "अमृत विचार" वायरल पत्र की पुष्टि नहीं करता है।
जनपद के एक न्यायालय में तैनात महिला सविल जज जूनियर डिवीजन का एक पत्र जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो न्यायिक गलियारे से लेकर समूचे जिले में सनसनी फैल गई। सिविल जज ने एक अन्य जिले में तैनाती के दौरान तत्कालीन जिला जज पर यौन उत्पीड़न और रात में मिलने के लिए बुलाने का आरोप लगाया था । जिसमे हाईकोर्ट से आजतक न्याय नहीं मिलने से आहत होकर सीजेआई को पत्र लिखने की बात लिखी गई है। सिविल जज ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को मार्मिक पत्र लिखकर बताया है कि घटना की जानकारी हाईकोर्ट को दी गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होने से खुद को निराश बताया है। पत्र में लिखा है कि मैं यह पत्र अपने सबसे बड़े अभिभावक (सीजेआई) से इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करने की प्रार्थना करने के लिए लिख रही हूं। लिखा है कि मैं न्यायिक सेवा में आम लोगों को न्याय दिलाने के लिए शामिल हुई थी, लेकिन मैं नहीं जानती थी कि मुझे जल्दी ही न्याय का भिखारी बना दिया जाएगा। सिविल जज ने आगे लिखा है कि मेरे साथ हद दर्जे तक यौन उत्पीड़न और कूड़े जैसा व्यवहार किया गया है, जिससे मेरी न्याय की आशा समाप्त सी हो गई है।
पत्र में दिया वर्किंग वूमेन को संदेश
सीजेआई को लिखे पत्र में यौन उत्पीड़न की शिकार महिला सिविल जज ने कहा है कि वर्किंग वूमेन यौन उत्पीड़न के साथ काम करना सीख लें, यह जीवन का सत्य है। उन्होंने पत्र में स्पष्ट लिखा है कि मैं एक जज हूं और सभी को न्याय दिलाने का काम करतीं हूं, लेकिन मेरे साथ हुई घटना पर भी मुझे न्याय नहीं मिला। मैं सभी महिलाओं को सलाह देती हूं कि वह खिलौना या निर्जीव वस्तु बनकर रहें।
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