बरेली: उपभोक्ता आयोग में आकर अटके तो 15 कभी 20 साल तक भटके, तीन हजार से ज्यादा केस लंबित

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

जागो उपभोक्ता के गीत गाने वाला सरकारी तंत्र आयोग को नहीं दे सका पर्याप्त संसाधन, खामियाजा भुगत रहे हैं हजारों उपभोक्ता

अनुपम सिंह, बरेली। सरकारी प्रचार तंत्र ने उपभोक्ताओं को तो जागरूक बना दिया लेकिन उन्हें न्याय दिलाने का इंतजाम नहीं कर पाया। नब्बे दिन के अंदर वादों के निस्तारण का मानक होने के बावजूद उपभोक्ता आयोग में लंबित फाइलों का ढेर दम तोड़ती उम्मीदों का हाल बता रहा है। तेजी से बढ़ते वादों और सुस्त निस्तारण का नतीजा है कि आयोग में तीन हजार से ज्यादा अर्जियां लंबित पड़ी हैं। 15 से 20 साल पुराने मामलों में भी वादकारियों को इंतजार करना पड़ रहा है। संक्षिप्त विचारण यानी जल्द सुनवाई के लिए उपभोक्ता आयोग में दाखिल अर्जियां भी लंबे समय से अटकी पड़ी हैं।

न्यायालय जिला उपभोक्ता विवाद प्रतिताेष आयोग में अध्यक्ष न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं जो वाद दायर करने के 90 दिन के अंदर सुनवाई कर फैसला सुना देते हैं, मगर जिला मुख्यालय पर जिला उपभोक्ता आयाेग प्रथम और द्वितीय में लंबित वादों का ढेर लगा हुआ है। इनकी तादाद न्याय की प्रक्रिया की बेहद सुस्त रफ्तार की ओर साफ इशारा करती है। आंकड़ों के अनुसार उपभोक्ता आयोग प्रथम में 31 दिसंबर तक 2045 और द्वितीय में करीब 12 सौ अलग-अलग मामलों की अर्जियां लंबित हैं। इनमें प्रथम आयोग में 2023 की 490 और द्वितीय में 281 मामले लंबित हैं।

लंबित वादों में सैकड़ों की तादाद उन वादों की है जो 2010 से अब तक के हैं। कई केस 2004 तक से लंबित हैं। वादकारी तारीख दर तारीख अब तक इनके निर्णीत होने का इंतजार कर रहे हैं। वादों के निस्तारण की गति कितनी धीमी है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वर्ष 2023 में आयोग प्रथम में करीब दो सौ ही वादों का निस्तारण हो पाया। आयोग द्वितीय में भी लगभग यही स्थिति है। उपभोक्ता मामलों के जानकारों का भी मानना है कि आयोग में निस्तारण की गति अपेक्षा से काफी सुस्त है।

दोनों उपभोक्ता आयोग में सदस्यों की कमी
उपभोक्ता आयोग में एक अध्यक्ष और दो सदस्यों के पद होते हैं। एक सदस्य पद महिला और दूसरा पुरुष का होता है। जिला मुख्यालय पर दोनाें आयोग में सदस्यों के पद खाली हैं। बताया जा रहा है कि आयाेग प्रथम में खाली दोनों पदों पर चयन तो हो गया है, लेकिन सदस्यों ने अभी कार्यभार ग्रहण नहीं किया है। आयोग द्वितीय में महिला सदस्य का पद खाली है।

ये है अर्जी डालने की व्यवस्था
जिला मुख्यालय पर दोनों उपभोक्ता आयोग में क्रमवार वाद दर्ज किए जाते हैं। व्यवस्था के अनुसार एक महीने प्रथम आयोग और फिर एक महीने द्वितीय आयोग में वाद दाखिल किए जाते हैं।

20 साल से न्याय का इंतजार कर रहे हैं रवीद्र, जयेंद्र आठ साल से
कालीबाड़ी के रवींद्र नाथ शर्मा ने बिजली का बिल त्रुटिपूर्ण होने पर 2004 में उपभोक्ता फोरम (अब आयोग) में वाद दायर किया था। आयोग ने 2004 में ही बिजली विभाग को सही बिल जारी करने का आदेश दे दिया था, लेकिन अब तक बिल सही नहीं हुआ है। रवींद्र के वकील मो. खालिद जीलानी ने केस के निष्पादन के लिए अपील दायर की। इस पर आयोग ने विद्युत नगरीय वितरण खंड द्वितीय के अधिशासी अभियंता को हाजिर होने का आदेश दिया।

वह हाजिर न हुए तो 24 नवंबर को वारंट जारी हुआ। अब जनवरी की तारीख लगी है। जयेंद्र ने भी 2017 में यूपीपीसीएल के खिलाफ वाद दायर किया था। 2019 में यशपाल सिंह ने एक डॉक्टर के खिलाफ अर्जी दायर की। सूरज ने 2021 में आईसीआईसीआई बैंक को पार्टी बनाकर वाद दायर किया, लेकिन ये तीनों मामले भी अब तक लंबित हैं। किसी में सुनवाई तक नहीं हो सकी है।

उपभोक्ता आयोग में वाद दायर करने के लिए सिविल काेर्ट की तरह सुबूत नहीं देने होते। कुछ दस्तावेज के साथ वाद दाखिल हो जाते हैं। 90 दिन में फैसला सुनाना होता है। आयोग में केसों की संख्या काफी ज्यादा है। एक जज एक दिन में कितने केस में सुनवाई करेगा। नियमित सुनवाई न होने से भी मामले लंबे खिंचते हैं--- मो. खालिद जीलानी, उपभोक्ता मामलों के जानकार।

उपभोक्ता मामलों के किसी भी प्रकरण में छह महीने से एक साल के अंदर तक निस्तारण कराने की कोशिश करता हूं, लेकिन सुनवाई के दौरान कई तरह की अड़चनें आती रहती हैं। आयोग पर लंबित मुकदमों का भार काफी ज्यादा है। अपील के मामलों की वजह से लंबित प्रकरणों की संख्या अधिक हो जाती है--- संजय वर्मा, उपभोक्ता मामलों के जानकार।

-20 लाख तक मामलों की 2019 से पहले तक होती थी सुनवाई।
-01 करोड़ के मामलों की सुनवाई का आदेश हुआ 2019 के बाद।
-50 लाख तक के वादों की अब होती है आयाेग में सुनवाई।

यह भी पढ़ें- बरेली: तीन सौ बेड अस्पताल में नहीं फिजिशियन, मरीज परेशान

संबंधित समाचार