किसानों से अवैध वसूली से जुड़े मामलों में जांच के होने चाहिए विशेष प्रावधान: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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Edited By Amrit Vichar
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अमृत विचार लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोऑपरेटिव सोसाइटी में हुए गबन के मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि जब भी कोई प्राथमिकी दर्ज की जाती है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस मामले में जांच शुरू करना अनिवार्य है और ऐसा भी नहीं है कि प्राथमिकी के दुरुपयोग की संभावना को रोकने के लिए संहिता में कोई अंतर्निहित सुरक्षा उपाय नहीं है। अगर दर्ज प्राथमिकी के अनुपालन में पुलिस ने जांच शुरू भी कर दी है तो पीड़ित व्यक्ति सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत उचित आदेश लेने के लिए मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकता है। 

अगर जांच के दौरान शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि हो जाती है तो आरोप पत्र दाखिल किया जाता है अन्यथा पुष्टि न होने पर अंतिम रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल की जाती है। सहकारी समिति अधिनियम का अधिनियमन किसानों को पारंपरिक बिचौलियों द्वारा शोषण से बचाने, उन्हें उनकी उपज के लिए उचित मूल्य प्राप्त करने और उनके आर्थिक हितों की रक्षा सुनिश्चित करने की इरादे से किया गया है। सहकारी समितियों के माध्यम से सहकारिता विभाग किसानों को सामान्य शर्तों पर सुलभ ऋण की सुविधा प्रदान करता है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस बात पर आपत्ति दर्ज की कि उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 सोसाइटी निधि के गबन और किसानों से ऋण की अवैध वसूली से जुड़े मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने की विशिष्ट प्रक्रिया पर मौन है। इस संबंध में सामान्य कानूनी सिद्धांत ही लागू होते हैं जबकि इसके लिए विशेष प्रावधान होना चाहिए। 


ये आदेश आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार बिड़ला और न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की खंडपीठ ने अजय राय की याचिका को खारिज करते हुए पारित किया। वर्तमान मामला समिति के कार्यवाहक सचिव द्वारा गरीब किसानों से अवैध रूप से एकत्र किए गए 16,17,833 रुपए की राशि के गबन से जुड़ा है। प्राथमिकी का पंजीकरण तीन सदस्यीय समिति द्वारा जांच के बाद किया गया। याची ने पुलिस स्टेशन दुल्लहपुर, गाजीपुर में आईपीसी की धारा 409 के तहत दर्ज प्राथमिकी की वैधता को चुनौती दी है। मामले के अनुसार सिखड़ी समिति में अपर जिला सहकारी अधिकारी द्वारा निरीक्षण के दौरान कार्यवाहक सचिव(याची) को कुछ अवैधताओं में लिप्त पाया गया।

मामले की सूचना समिति के अध्यक्ष को दी गई, जिसके कारण याची को निलंबित कर दिया गया। इसके बाद उपरोक्त अधिनियम की धारा 66 का प्रयोग करते हुए तीन सदस्यीय समिति से विस्तृत जांच कराई गई। जांच के द्वारा पता चला कि याची ने उक्त धनराशि का दुरुपयोग किया था। हालांकि याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याची को विभाग द्वारा गलत ढंग से फंसाया गया है।

 प्रथम दृष्टया इस मामले में आईपीसी की धारा 409 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। इसके साथ ही याची के अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि वर्तमान प्राथमिकी शासनादेश दिनांक 16.8.2000 का उल्लंघन है, जिसके अनुसार ऐसे मामलों में क्षेत्रीय उपायुक्त, वाराणसी को प्राथमिकी दर्ज करने का अधिकार है जबकि वर्तमान मामले में अपर जिला सहकारी अधिकारी, जखनिया, गाजीपुर की शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई है।

अधिवक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि उक्त अधिनियम की धारा 65(2) के तहत विवादित प्राथमिकी के पंजीकरण से पहले याची से पूछताछ नहीं की गई। अंत में कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि विवादित प्राथमिकी का पंजीकरण अधिनियम के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं करता है। अतः याचिका को तर्कहीन मानते हुए खारिज कर दिया। 

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