बरेली: श्रीराम होंगे विराजमान, गर्व से भर उठी यातनाओं की पीड़ा
मलूकपुर की प्रेमलता रस्तोगी बेटे और पति को याद कर हो गईं भावुक, राममंदिर आंदोलन में बेटा और पति ने सहीं पुलिस की यातनाएं
बरेली, अमृत विचार। 22 जनवरी को श्रीराम अयोध्या में अपने जन्मस्थान पर विराजमान हो रहे हैं। हर ओर श्रद्धा का माहौल है। गांव, शहर, कस्बे राममय हो रहे हैं। ऐसे में उनकी याद आना स्वाभाविक है जिन्होंने राम जन्मभूमि के लिए आंदाेलन में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। भले ही इस आंदोलन में शामिल बड़ी संख्या में रामभक्त अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन परिवारीजनों के लिए ये गर्व का क्षण है।
वे उत्साह से भर उठते हैं कि जन्मभूमि पर रामलला के विराजमान होने में उनके भी किसी अपने का योगदान है। हालांकि वे करीब 34 साल पहले के उस आंदोलन के दौरान की यातनाओं को याद कर भावुक हो उठते हैं।
मलूकपुर निवासी प्रेमलता रस्तोगी उन्हीं में से हैं। करीब 75 वर्षीय प्रेमलता बताती हैं कि उनके चार बेटे जितेन्द्र रस्तोगी, धर्मेन्द्र, महेन्द्र , मोहित थे। 90 के रामजन्म भूमि आंदोलन में धर्मेन्द्र सक्रिय था। बजरंग दल का गठन हुआ तो धर्मेन्द्र को महानगर की जिम्मेदारी दी गई। उसने रामशिला पूजन, राम ज्योति, चरण पादुका कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर भाग लिया।
आंदोलन में उसकी सहभागिता बढ़ती जा रही थी और वह युवाओं के संगठनकर्ता के रूप में उभर रहा था। 92 में जब मस्जिद ढहा दी गई तो पुलिस ने धर्मेन्द्र की निगरानी बढ़ा दी। गुलशन आनंद पर भी पुलिस की नजर थी। वायरलेस पर निगरानी संबंधी संदेश गूंजते रहते थे। उस समय नावेल्टी चौराहा पर मजार कांड हुआ। उसमें परिवार पर मुकदमा दर्ज हुआ जो अब तक चल रहा है।
प्रेमलता बताती हैं कि परिवार ने पुलिस की खूब यातनाएं सहीं। दो वर्ष तक पुलिस ने हर गतिविधि पर नजर रखी। किसी कार्यक्रम में जाना हो तो भी पुलिस कर्मी पीछे ही जाता था। कार सेवकों का जेल भरो आंदोलन हुआ तो धर्मेन्द्र पर दबाव बनाने और सक्रियता कम करने के लिए पुलिस ने उसके पिता शिव ओम रस्तोगी को गिरफ्तार कर लिया और किशोर सदन जेल में रखा। वहां उनको पीटा और यातनाएं दी गईं लेकिन उन्होंने पुलिस को किसी कारसेवक की जानकारी नहीं दी।
वे बताती हैं कि पुलिस की पिटाई से घायल पति को देखने बजरंग दल के संयोजक विनय कटियार भी मलूकपुर उनके घर आये थे। उन्होंने परिवारीजनों का हौसला बढ़ाया। उस समय स्वयं सेवक संघ के विभाग प्रचारक रामलाल और दिनेश उपाध्याय का ही नेतृत्व था जो कारसेवकों में उत्साह और जोश भरता था। बताती हैं कि पुलिस की पिटाई से घायल पति की काफी इलाज के बाद मौत हो गई। धर्मेंद्र की भी मृत्यु हो गई। स्वर्णकारी का काम था वह भी प्रभावित हुआ।
प्रेमलता कहती हैं कि भले ही उनके परिवार के योगदान को भूल गये हों। भाजपा की सरकार बनने के बाद भी अपेक्षित सराहना न मिली हो लेकिन अब मंदिर अपने भव्य रूप को ग्रहण करने वाला है और प्रभु श्री राम विराजने वाले हैं। इससे बड़ी गर्व की बात हो ही नहीं सकती। गर्व है कि पुत्र, पति व परिवार इस आंदोलन का हिस्सा रहा है।
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